जीवन को बनाना हो बेहतर तो विरोधियों से भी सीखें…

Oct 13, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, सामान्यतः हम सभी को अपनी तारीफ़ सुनना बहुत पसंद आता है, लेकिन जब कोई हमारी आलोचना करता है, तो हम तुरंत बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। इसी तरह, जब कोई हमारा पक्ष लेते हुए कहता है, “आप बिल्कुल सही हैं”, तो हमें अच्छा लगता है, लेकिन जब कोई हमारी गलती की ओर ध्यान दिलाता है, तो हम उससे नाराज़ तक हो जाते हैं। शायद यही कारण है कि हम कई बार ख़ुद को बेहतर बनाने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर गँवा देते हैं।
इसी बात के महत्त्व को समझाते हुए प्रसिद्ध विचारक बालथसर ग्रेशियन ने कहा था—
“एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने दुश्मनों से उतना अधिक लाभ उठा लेता है, जितना एक मूर्ख अपने मित्रों से भी नहीं उठा पाता।”
बात थोड़ी चुभने वाली है या यूँ कहूँ कि पहली नज़र में कुछ अजीब-सी लगने वाली है। लेकिन ज़रा सोचकर देखिए, मित्र अक्सर हमारी अच्छाइयाँ देखते हैं। वे हमारा उत्साह बढ़ाते हैं, हमारी उपलब्धियों पर ख़ुश होते हैं और मुश्किल समय में हमारा साथ देते हैं। लेकिन कई बार उनका अपनापन उन्हें हमारी कमियाँ खुलकर बताने से रोक देता है।
दूसरी ओर, विरोधी हमारी कमज़ोरियों को क़रीब से देखता है। उसकी बातों में ईर्ष्या हो सकती है, उसका उद्देश्य हमें नीचा दिखाना हो सकता है और उसकी भाषा भी अनुचित हो सकती है। फिर भी, उसकी आलोचना में कभी-कभी हमारे लिए कोई ज़रूरी सच छिपा होता है—ऐसा सच, जो हमें ख़ुद को बेहतर बनाने का अवसर दे सकता है। लेकिन हम उस सच को सुन या समझ नहीं पाते, क्योंकि बात पर ध्यान देने से पहले ही हम बोलने वाले व्यक्ति को जज कर लेते हैं और उसके बारे में एक धारणा बना लेते हैं।आप ख़ुद विचार कीजिए: अगर कोई नापसंद व्यक्ति आपकी किसी कमी की ओर इशारा करे, तो क्या केवल इसलिए उसकी बात को ग़लत ठहरा देना उचित है कि वह आपका विरोध करता है? यह सही है कि हर आलोचना सही नहीं होती और हर विरोधी सही नहीं होता। लेकिन हर आलोचना को तुरंत ख़ारिज कर देना भी समझदारी नहीं है।
इसलिए दोस्तों अगर कभी भी कोई आपकी आलोचना करे, तो प्रतिक्रिया देने से पहले खुद से एक सवाल पूछिए, “इस बात में थोड़ी सी भी सच्चाई है क्या?” अगर है, तो उस छोटी सी बात को पकड़ लीजिए। हो सकता है किसी ने आपके बोलने के तरीक़े पर सवाल उठाया हो और आपको अपना तरीका सुधारने की जरूरत हो। किसी ने आपके व्यवहार की आलोचना की हो और उसमें कोई ऐसी बात हो, जिसे आपके करीबी लोग भी आपको बताने से बचते रहे हों। किसी ने आपकी कार्यशैली पर सवाल उठाया हो और वही बात आपके लिए अगला सुधार-बिंदु बन जाए। बुद्धिमान व्यक्ति आलोचना से आहत होने के बजाय उसमें छिपी सुधार की गुंजाइश को खोजता है।
दोस्तों, इसका अर्थ यह नहीं कि हमें हर विरोधी की बात मान लेनी चाहिए। इसका अर्थ केवल इतना है कि हमें अपने अहंकार को इतना बड़ा नहीं होने देना चाहिए कि वह किसी उपयोगी सीख को अंदर आने ही न दे। मित्रों से हमें प्रोत्साहन मिलता है आलोचकों से हमें आईना मिल सकता है और जीवन में दोनों की जरूरत है। याद रखिएगा, जो व्यक्ति केवल प्रशंसा सुनना चाहता है, वह अपनी कमियों से अनजान रह सकता है। लेकिन जो व्यक्ति असहज सवालों का सामना करने का साहस रखता है, वह लगातार बेहतर बन सकता है।
इसलिए अगली बार कोई आपका विरोध करे, तो तुरंत यह मत सोचिए, “यह मेरे खिलाफ क्यों है?” बल्कि एक पल रुककर यह समझने का प्रयास कीजिए कि सामने वाला आपको आपके अंदर छुपी किस कमी को पहचानने में मदद कर रहा है। याद रखियेगा दोस्तों, यह बिल्कुल संभव है कि आपका सबसे बड़ा सुधार उसी बात के पीछे छिपा हो, जिसे सुनना आपको सबसे ज्यादा बुरा लगा था।
याद रखिए, मित्र आपको आपकी ताकत का एहसास कराते हैं, लेकिन कभी-कभी विरोधी आपकी कमजोरी का आईना बन जाते हैं। इसलिए बुद्धिमानी इस बात में नहीं कि हम विरोधियों को खत्म कर दें; बुद्धिमानी इस बात में है कि उनके विरोध से भी अपने विकास का रास्ता खोज लें।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




Comments