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अपनों के लिए खड़े रहना सीखिए…

Writer: Trupti Bhatnagar
Trupti Bhatnagar
4 hours ago
3 min read

Nov 2, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, चलिए एक कहानी के साथ आज के शो की शुरुआत करते हैं। एक परिवार में चार भाई थे। सभी अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त थे। किसी का कारोबार अच्छा चल रहा था, कोई नौकरी में सफल था और किसी ने अपनी अलग पहचान बना ली थी। परिवार में सभी सदस्य सभी त्यौहार साथ मनाते थे और खुशियों के अवसर पर सब एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई देते थे।


वैसे तो सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ निर्णय ग़लत होने के कारण परिवार के सबसे बड़े भाई को कारोबार में भारी नुकसान हो गया। जिसकी वजह से उनपर कर्ज बढ़ने लगा और धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें अपना घर तक बेचने का निर्णय लेना पड़ा। ये मेरी नजर में परिवार के लिए परीक्षा का क्षण था क्योंकि बाक़ी भाइयों के पास केवल सहानुभूति जताकर अपनी-अपनी जिंदगी में लौट जाने या फिर मिलकर इस मुश्किल का सामना करने का विकल्प था। उसी सप्ताह रविवार को तीनों भाइयों ने मिलकर बात की और किसी ने आर्थिक मदद की जिम्मेदारी ली, किसी ने कारोबार को दोबारा खड़ा करने में सहयोग देने का निर्णय लिया और किसी ने परिवार की दूसरी जिम्मेदारियाँ सम्भाल ली। कुछ ही वर्षों में सब कुछ पूर्व की ही तरह सामान्य हो गया याने फिर से बड़े भाई का कारोबार अच्छा चलने लगा। उस दिन बड़े भाई ने कहा, “आज मुझे समझ आया कि मेरी असली संपत्ति मेरा कारोबार नहीं, मेरा परिवार है। बीतते समय के साथ कारोबार तो शायद दोबारा खड़ा हो जाता, लेकिन अगर तुम लोग साथ न होते, तो शायद मैं खुद को दोबारा खड़ा नहीं कर पाता।”


दोस्तों, यह कहानी हमें जीवन की एक महत्वपूर्ण सीख देती है, परिवार की असली ताकत सिर्फ़ एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होना नहीं है। उसके लिए तो किसी एक की परेशानी में पूरे परिवार का साथ खड़े रहना या दूसरे शब्दों में कहूँ तो किसी एक की परेशानी पूरे परिवार की जिम्मेदारी बन जाना होता है। इसी बात के महत्व को समझते हुए प्रसिद्ध लेखक मारियो पूज़ो ने परिवार की ताकत की तुलना एक सेना से करते हुए कहा है कि जिस तरह सेना की शक्ति उसके सैनिकों की एक-दूसरे के प्रति निष्ठा में होती है, उसी तरह परिवार की मजबूती भी सदस्यों की आपसी वफादारी में छिपी होती है। लेकिन याद रखिएगा, वफादारी का अर्थ हर बात पर सहमत होना नहीं है। इसका अर्थ है कि परिवार के किसी सदस्य की अनुपस्थिति में भी उसके सम्मान की रक्षा करना और असफलता के दौर में उसका मज़ाक उड़ने के स्थान पर उसका हाथ थामना।


दोस्तों, अक्सर हम परिवार में एक-दूसरे से अपेक्षाएँ रखते हैं, लेकिन ख़ुद कभी यह नहीं सोचते कि हम स्वयं कितने भरोसेमंद हैं। अगर आप इस विषय में गंभीर हैं तो फिर आज ही एक छोटा सा प्रयास कीजिए और परिवार के किसी ऐसे सदस्य से बात कीजिए, जिससे पिछले कुछ समय से आपकी बातचीत कम हो रही है या परिवार के सदस्यों की ज़रूरत को बिना कहे समझने की कोशिश कीजिए। कभी-कभी एक फोन, एक मुलाकात या मदद का छोटा-सा प्रस्ताव रिश्तों में नई गर्माहट ला सकता है। याद रखिएगा, परिवार की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि उसके सदस्य व्यक्तिगत तौर पर कितने सफल हैं, बल्कि यह है कि मुश्किल समय में वे एक-दूसरे के साथ कितना खड़े रहते हैं।


दोस्तों, ‘संपर्क होने’ और ‘संबंध होने’ का फ़र्क़ इतना ही है। ‘संपर्क वाले’ सफलता में साथ खड़े होंगे और ‘संबंध वाले’ असफलता के दौर में भी हाथ थामे रहेंगे। इसलिए ऐसे पारिवारिक संबंध बनाइए जहाँ हर सदस्य को भरोसा हो कि जीवन में कभी कठिन समय आ भी गया तो उसे मुझे अकेले नहीं लड़ना होगा। याद रखिएगा, परिवार केवल हमारा अतीत और पहचान नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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