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अपेक्षा रहित सेवा से बदलें अपना जीवन…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Dec 22, 2025
  • 1 min read

Dec 22, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, मनुष्य का जीवन केवल पाने के लिए नहीं, बल्कि देने के लिए भी है। सामान्यतः इंसान सिर्फ़ माँगता ही रहता है, लेकिन प्रकृति का नियम कुछ ऐसा है जहाँ ‘देना ही पाना’ बन जाता है। अर्थात् जब आप ‘देते’ हैं, तब प्रकृति स्वयं आपको किसी ना किसी रूप में लौटती है और जब ‘देना’ निस्वार्थ भाव से होता है, तब वही सेवा ईश्वर की आराधना बन जाती है। यह जानने के बाद भी अक्सर हम सेवा करते समय एक अदृश्य शर्त जोड़ लेते हैं और सेवा के बदले में मान, सम्मान, प्रशंसा या कृतज्ञता की अपेक्षा रखना शुरू कर देते हैं। यहीं से सेवा अपना पवित्र स्वरूप खो देती है और धीरे-धीरे निराशा में बदल जाती है। चलिए इसे कुछ बिंदुओं में विस्तार से समझते हैं -


1. अपेक्षा सेवा को बोझ बना देती है

जब हम किसी की मदद इस आशा से करते हैं कि ‘वह धन्यवाद देगा’, ‘कभी काम आएगा’, या ‘समाज हमें इसके लिए सराहेगा’, तब हमारी सेवा निस्वार्थ नहीं रहती। ऐसी सेवा का अंत प्रायः दुख में होता है क्योंकि हर मनुष्य का अपना नजरिया होता है, अपनी सोच होती है। इसलिए वो हमेशा आपकी भावना को समझ नहीं पाता और इसलिए वो आपकी अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाता। और जब अपेक्षा टूटती है, तो वही सेवा हमें चुभने लगती है।


2. सच्ची सेवा का मूल्य मनुष्य नहीं, ईश्वर देता है

यह एक कटु सत्य है कि सेवा का वास्तविक मूल्य कोई व्यक्ति, संस्था या समाज नहीं चुका सकता क्योंकि सेवा कोई वस्तु नहीं है, जिसका मोल लगाया जा सके। यदि सेवा का मूल्य इस दुनिया ने अदा कर दिया, तो समझ लीजिए, वह सेवा नहीं थी, वह एक लेन-देन था। ईश्वर ही वह शक्ति है जो निस्वार्थ भाव को पहचानती है और सही समय पर, सही रूप में उसका फल देती है।


3. प्रसिद्धि नहीं, पुण्य का मार्ग है सेवा

फोटो, प्रचार, नाम और पहचान के साथ, आज के समय में सेवा भी एक प्रदर्शन बनती जा रही है। लेकिन याद रखिए, सेवा का उद्देश्य लोगों की तालियाँ पाना नहीं, अंतरात्मा की शांति पाना है। जो सेवा प्रसिद्धि के लिए की जाए, वह अहंकार को बढ़ाती है।और जो सेवा बिना दिखावे के हो, वह आत्मा को ऊँचा उठाती है।


4. सभी की सेवा करें, आशा किसी से न रखें

जीवन का एक महान सूत्र है, “सेवा सबकी करो, पर अपेक्षा किसी से मत रखो।” जब आप यह सीख लेते हैं, तो आप भीतर से स्वतंत्र हो जाते हैं। न किसी के व्यवहार से दुखी होते हैं, न किसी की उपेक्षा से टूटते हैं। आप सेवा इसलिए करते हैं क्योंकि यह आपका स्वभाव है, आपका धर्म है, आपकी आत्मा की पुकार है।


5. ईश्वर की दृष्टि में सम्मान सबसे बड़ा है

दुनिया की नजरों में सम्मानित होना एक क्षणिक उपलब्धि है, आज है, कल नहीं। लेकिन ईश्वर की दृष्टि में सम्मानित होनाएक स्थायी अनुभूति है। वह आपके हृदय की भावना देखता है, न कि आपके कर्म का प्रचार और जब कोई व्यक्ति ईश्वर की दृष्टि में सम्मानित होता है, तो उसका जीवन स्वयं उदाहरण बन जाता है।


निष्कर्ष के तौर पर अंत में इतना ही कहूँगा कि सेवा को सौदा मत बनाइए, साधना बनाइए। सेवा तभी पवित्र रहती है, जब उसमें कोई अपेक्षा न हो। जब आप बिना कुछ चाहें देते हैं, तभी आप भीतर से भरते हैं। यही सोच जीवन को सिद्ध करती है कि सच्ची सेवा दुनिया से कुछ पाने का माध्यम नहीं, ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है। इसलिए अपेक्षा छोड़िए, सेवा अपनाइए, और देखिए, जीवन कैसे भीतर से बदलने लगता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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