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अपेक्षाओं से ऊपर उठकर जीना…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Dec 29, 2023
  • 1 min read

Dec 29, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक ऐसी कहानी से करते हैं, जिसके मर्म को समझकर हम, जो हमारे पास उपलब्ध है, उसी में जीवन भर खुश रह सकते हैं, तो चलिए शुरू करते हैं। राजपुर के राजेश के परिवार में आज सभी बहुत ख़ुश थे क्योंकि वे कल अपने नये घर में शिफ्ट होने वाले थे। इस नये घर में राजेश ने लगभग सभी कुछ नया लाने का प्रयास किया था। जैसे, बर्तन, फर्नीचर, फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि। हालाँकि इस ख़ुशी के साथ उन्हें एक बात की चिंता और थी, पुराने सामान को ठिकाने लगाना। इसलिए परिवार के सभी सदस्य ज़्यादातर सामान को किसी ना किसी को दे रहे थे। 


राजेश के यहाँ काम करनेवाली शीला बाई भी आज काफ़ी खुश थी क्योंकि उसे अंदेशा था कि आज ‘दीदी’ याने राजेश की पत्नी उसे भी कुछ ना कुछ सामान घर ले जाने के लिए देगी। इसी आशा में आज वह दोगुने जोश से काम पूरा करवाने में हाथ बटा रही थी। ख़ैर, किसी तरह शाम तक कार्य पूर्ण कर वह घर जाने की तैयारी कर ही रही थी कि दीदी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, ‘अरे सुन, इस सामान में से जो भी कुछ तू ले जाना चाहती हो, ले लेना।’ दीदी के इन शब्दों को सुनते ही शीला बाई के चेहरे की चमक दुगनी हो गई। उसने उस पुराने सामान में से कुछ बर्तन, कुछ कपड़े और घर सजाने-संवारने का कुछ सामान चुना और दीदी को दुआएँ देती हुई चली गई।


घर पहुँचते ही शीला ने पहले तो सभी घरवालों को आवाज़ देकर एक जगह इकट्ठा करा और सभी को ख़ुशी-ख़ुशी ‘दीदी’ के घर से लाये सामान को दिखाने लगी। इसके बाद शीला ने अपने पूरे घर की सफ़ाई करी और ‘दीदी’ के यहाँ से लाये सामान को क़रीने से जमा कर रख दिया। साफ़-सफ़ाई और नये सामान को जमाने की इस प्रक्रिया में अब शीला के घर से भी कुछ पुराना सामान निकला था, जो उसके लिए किसी भी तरह से उपयोगी नहीं था। उसने उन सभी सामान को क़रीने से घर के बाहर एक कोने में यह सोच कर रख दिया कि कोई अटाले वाला आएगा तो उसे बेच देगी।


अटाला वाला आता और उस सामान को ख़रीदता, उससे पहले ही एक भीख माँगने वाला बाबा शीला के घर आ गया। उसने घर के बाहर रखे कुछ पुराने बर्तनों को देखा और उसे कई मिनिटों तक निहारता ही रहा। तभी शीला वहाँ पहुँची और बोली, ‘क्या हुआ बाबा? ऐसे इन पुराने बर्तनों को क्यों निहार रहे हो?’ शीला की आवाज़ सुन बाबा एक पल के लिये घबरा ही गए फिर बड़ी हिम्मत के साथ बोले, ‘अगर यह पुराने बर्तन आपके किसी काम के ना हों, तो क्या मैं इन्हें ले सकता हूँ?’ शीला ने सोचा कबाड़ या भंगार वाले का इंतज़ार करने से तो बेहतर इस सामान को इन बाबा को देना है। कम से कम इस कबाड़ से तो मुक्ति मिल ही जाएगी।


विचार आते ही शीला ने बाबा को पुराने बर्तनों को ले जाने की अनुमति दे दी, जिसे सुन बाबा का चेहरा कुछ इस तरह खिल गया जैसे उसे अलीबाबा का ख़ज़ाना मिल गया हो। अब वह ख़ुद को दुनिया का सबसे क़िस्मत वाला इंसान मान रहा था। अब उसके पास एक थाली, एक पतीला, तुड़ा-मुड़ा एक चम्मच, एक घिसा हुआ ग्लास और भी ना जाने क्या-क्या था। वो भिखारी आज सातवें आसमान पर था। आज उसकी फटी झोली पूरो तरह भरी हुई थी।


दोस्तों, अब अगर आप पूरे क़िस्से पर एक बार फिर गौर करेंगे तो पायेंगे कि इस पूरे घटनाक्रम में हर कोई स्वयं को खुश और सुखी मान रहा था। कोई नया सामान पाकर सुख और ख़ुशी को महसूस कर रहा था, तो कोई, तिरस्कार किए गए पुराने सामान को पाकर। दूसरे शब्दों में कहूँ, तो किसी को पुराने सामान से छुटकारा पाने में ख़ुशी मिल रही थी, तो कोई उसी पुराने सामान को पाकर खुश था।


इस आधार पर देखा जाये दोस्तों, तो सुख और ख़ुशी संसाधनों पर नहीं बल्कि उनको लेकर आपकी सोच और अपेक्षाओं पर निर्भर करती है। अगर आपकी अपेक्षा पूर्ण हुई, तो आप खुश और अगर नहीं हुई तो आप दुखी। इसी आधार पर और गंभीरता से सोचा जाए तो आप पायेंगे कि अगर किसी तरह अपेक्षाओं से ऊपर उठकर जीना सीख लिया जाए, तो आप हमेशा सुखी रह सकते हैं। एक बार विचार कर देखियेगा…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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