जेब भरने से पहले दिमाग़ भरें…
- Nirmal Bhatnagar

- 1 hour ago
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June 27, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज का युग एक अजीब दौड़ का युग बन गया है। जिसमें हर कोई भाग रहा है, और इसमें मजे की बात यह है कि अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता कि वे भाग क्यों रहे हैं? याने वे ये जानते ही नहीं हैं कि वे पहुँचना कहाँ चाहते हैं? इनमें से किसी ने बड़े बैंक बैलेंस को लक्ष्य बनाया है, तो कोई बड़ी गाड़ी के लक्ष्य के साथ चल रहा है। कोई आलीशान बंगला चाहता है। कुल मिलाकर कहा जाए तो भागदौड़ वाले इस युग में सफलता का पैमाना अब संपत्ति की मात्रा से मापा जाने लगा है।
दोस्तों, भागदौड़ और उलझन से भरे इस दौर में, मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, “क्या वास्तव में जीवन की गुणवत्ता बैंक बैलेंस से तय होती है या फिर माइंड बैलेंस से?” थोड़ा आराम से सोच कर जवाब दीजिए। आप ऐसे अनेक लोगों को जानते होंगे जिनके पास धन की कोई कमी नहीं है, लेकिन उनके मन में शांति नहीं है। सोने के लिए रात को उन्हें नींद की गोलियाँ लेनी पड़ती हैं। ये लोग छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित हो जाते हैं, इनके रिश्तों में मिठास नहीं रहती और इनके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी बनी रहती है। जानते हैं क्यों? क्योंकि संपदा शरीर को सुख दे सकती है, लेकिन आत्मा को संतोष नहीं दे सकती। दोस्तों, इतिहास इस सत्य का गवाह है। रावण के पास सोने की लंका थी, लेकिन बुद्धि अहंकार से भर गई तो उसका वैभव उसे बचा नहीं सका। सिकंदर ने आधी दुनिया जीत ली, लेकिन जाते समय उसके हाथ खाली थे। जबकि इसके विपरीत कबीर, स्वामी विवेकानंद, लाल बहादुर शास्त्री आदि अनेक महापुरुष अपार धन छोड़कर नहीं गए, लेकिन अपने विचारों के कारण आज भी करोड़ों लोगों के जीवन को दिशा दे रहे हैं। इसलिए मेरा मानना है कि धन नहीं, विचार अमर होते हैं।
दोस्तों, बुद्धिमता का अर्थ केवल अधिक पैसा कमाना नहीं है। बुद्धिमता का अर्थ है, अपने मन को सम्भालना, अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना और सही समय पर सही निर्णय लेना। आज अधिकांश लोग दुनिया को जीतने में लगे हैं, लेकिन स्वयं के मन से हार रहे हैं। याद रखिए, जो व्यक्ति अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसे संसार की कोई चुनौती लंबे समय तक पराजित नहीं कर सकती।
अगर आप भी अपने मन के मालिक बनना चाहते हैं तो आज ही से स्वाध्याय को अपनाइए। जी हाँ दोस्तों, स्वाध्याय अपने मन को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। मेरा मानना है जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम आवश्यक है, उसी प्रकार मन को स्वस्थ रखने के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। यदि आप जिम नहीं जाएंगे तो शरीर में चर्बी बढ़ेगी और यदि आप अच्छी किताबें नहीं पढ़ेंगे, अच्छे विचारों से नहीं जुड़ेंगे और आत्मचिंतन नहीं करेंगे, तो मन में भ्रम, भय और अज्ञानता बढ़ेगी। याद रखियेगा, शरीर का पसीना मोटापा मिटाता है और दिमाग का पसीना अज्ञानता मिटाता है।
जिस तरह रोज़ 20 मिनट शरीर को देने से बीमारी स्वयं दूर रहती है, ठीक वैसे ही रोज़ 20 मिनट स्वाध्याय करने से जीवन में अनेक समस्याओं के समाधान स्वयं मिलने लगते हैं। आज का युवा रील्स, शॉर्ट्स आदि के साथ घंटों मोबाइल स्क्रीन पर बिताता है। जिसकी वजह से आज जानकारी बढ़ रही है, लेकिन समझ कम होती जा रही है। मनोरंजन बढ़ रहा है, लेकिन मन का संतुलन घटता जा रहा है। शायद यही कारण है कि तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं।
दोस्तों, स्वाध्याय का अर्थ केवल धार्मिक ग्रंथ पढ़ना नहीं है। अच्छी पुस्तक पढ़ना, किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के विचार सुनना, आत्ममंथन करना, अपनी गलतियों से सीखना और प्रतिदिन स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करना भी स्वाध्याय है। अंत में केवल तीन बातें याद रखिएगा, संपदा विरासत में मिल सकती है, लेकिन बुद्धिमता स्वयं अर्जित करनी पड़ती है। शरीर एक दिन समाप्त हो जाएगा, लेकिन श्रेष्ठ विचार पीढ़ियों तक जीवित रहेंगे। बैंक बैलेंस जीवन को सुविधाजनक बना सकता है, लेकिन माइंड बैलेंस ही जीवन को सुखद बनाता है। इसलिए आज से एक नया संकल्प लीजिए, “जेब भरने से पहले दिमाग भरना है। शरीर बनाने से पहले सोच बनानी है।” क्योंकि जीवन के अंतिम पड़ाव पर लोग यह नहीं पूछेंगे कि आपने कितना कमाया था, बल्कि यह याद रखेंगे कि आपने कितना सीखा, कितना सिखाया और कितना सार्थक जीवन जिया।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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