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आत्मसम्मान को बढ़ाना हो तो स्वीकारें यह 8 सत्य…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

Feb 6, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, जीवन में स्वास्थ्य, पैसे, पहचान और सफलता से भी ज्यादा जरूरी चीज आत्मसम्मान है। इंसान सब कुछ खोकर भी जीवन जी सकता है, लेकिन यदि वह अपनी ही नज़रों में गिर जाए, तो उसके भीतर की आग याने जीवन जीने की इच्छा धीरे-धीरे बुझने या ख़त्म होने लगती है। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ आत्मसम्मान हमारे जीवन की रीढ़ है, जिसके बिना सारी उपलब्धियां खोखली है।


अक्सर दूसरों को खुश करते-करते हम खुद को ही भूल जाते हैं। हर बात पर “हाँ”, हर माँग पर “ठीक है”, हर अपमान पर “चलता है”, जैसा नजरिया रखते हुए जीना आपको एक दिन ऐसी स्थिति में पहुँचा देता है कि हमें अचानक एहसास होता है कि हम जीवन भर सबके लिए उपलब्ध रहे, पर अपने लिए कभी समय नहीं निकाल पाये। यही वह क्षण होता है जो हमें जीवन में आत्मसम्मान की ज़रूरत महसूस करवाता है। आइए, आज हम आत्मसम्मान के संदर्भ में उन 8 महत्वपूर्ण सत्यों पर चर्चा करते हैं, जिन्हें अपनाना हमारे आत्मसम्मान को बढ़ा सकता है-


पहला सत्य: आत्म-सम्मान का अर्थ कठोर होना नहीं, स्पष्ट होना है


जहाँ सीमाएँ नहीं होतीं, वहाँ सम्मान भी नहीं टिकता। जब आप शांति से कहते हैं, “यह मेरे लिए उचित नहीं है,” तो दुनिया आपकी ऊर्जा, समय और गरिमा को गंभीरता से लेने लगती है।


दूसरा सत्य: जिसे आपकी क़दर है, उसे आपको मनाना नहीं पड़ता

अगर हर बार आप ही संवाद शुरू करें, हर बार आप ही रिश्ता बचाएँ, तो वह संबंध नहीं, बोझ है। इसलिए ही आत्मसम्मान के विषय में कहा जाता है, “जहाँ सम्मान न मिले, वहाँ रुकना भी अपमान है।”


तीसरा सत्य: अपनी कीमत खुद पहचानिए

दुनिया से पहले आप; ख़ुद को आँकते हैं और जब आप स्वयं को कम आँकते हैं, तब लोग आपको और ज़्यादा सस्ता समझने लगते हैं। इसलिए आज यह निर्णय लीजिए कि, “मैं स्वयं को किसी से कम नहीं मानूँगा।”


इसी सत्य को रतन टाटा ने अपने जीवन में जिया था। वे दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के मालिक रहे, फिर भी उन्होंने सादगी, गरिमा और मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने ऐसे प्रस्ताव ठुकराए जो आत्म-सम्मान के विरुद्ध थे, भले ही वे आर्थिक रूप से आकर्षक क्यों न हों। उनका जीवन बताता है, “आत्मसम्मान कीमत नहीं देखता, जीवन मूल्य देखता है।”


चौथा सत्य: अपमान सहने के स्थान पर वहाँ से दूर हो जाना ही सबसे बड़ी जीत है


रिश्ते बचाने के नाम पर खुद को रोज़ ख़ुद की नज़रों में गिराना समझौता नहीं, आत्म-हानि है। जहाँ इज़्ज़त नहीं होती, वहाँ संबंध भी नहीं होते, वहाँ तो सिर्फ मजबूरी होती है।


पाँचवाँ सत्य: समय और ऊर्जा सीमित हैं


इसलिए उन्हें वहाँ खर्च करें, जहाँ सम्मान मिले, विकास हो और सच्चा संबंध बने। जो आपकी कद्र नहीं करते, उन्हें अपनी ऊर्जा देकर आप अपने ही जीवन से अन्याय करते हैं।


छठा सत्य: हर जगह खुद को साबित करना आवश्यक नहीं

जहाँ आपके प्रयासों की कद्र नहीं, वहाँ और ज़्यादा मेहनत करना बुद्धिमानी नहीं। आत्मसम्मान कहता है, जहाँ आपकी उपस्थिति का मूल्य ना हो, वहाँ अनुपस्थिति ही सबसे बढ़िया उत्तर है।


सातवाँ सत्य: सच्ची शक्ति शोर नहीं करती

मजबूत व्यक्ति अपने बारे में बोलता नहीं, उसके कर्म ही उसका परिचय बन जाते हैं। शांत रहकर काम कीजिए, दुनिया खुद पूछेगी, “आपने यह कैसे किया?”


आठवाँ और अंतिम सत्य: प्रेम और स्वीकृति की भीख मत माँगिए

भीख में मिला प्रेम, प्रेम नहीं होता। दया में मिला सम्मान, सम्मान नहीं होता। जिसे आपके जीवन में रहना है, वह रहेगा, जिसे जाना है, उसे रोकना आत्मसम्मान का अपमान करना है।


समापन


दोस्तों, दुनिया आपको उतना ही महत्व देगी, जितना महत्व आप स्वयं को देंगे। इसलिए आज एक वचन दीजिए, “मैं अपनी गरिमा से समझौता नहीं करूँगा। मैं अपनी सीमाएँ स्पष्ट रखूँगा। मैं स्वयं को जानूँगा, मानूँगा और सम्मान दूँगा क्योंकि आत्मसम्मान के साथ जीने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर कभी कमज़ोर नहीं होता।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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