जो घट रहा है उसमें अर्थ खोजें…
- Nirmal Bhatnagar

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Feb 3, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आपने निश्चित तौर पर कभी ना कभी देखा या महसूस किया ही होगा कि एक ही परिस्थिति किसी के लिए पीड़ा बन नजर आती है तो किसी के लिए प्रसाद। आख़िर ऐसा होता क्यों है? मेरे अनुसार इसकी मुख्य वजह बाहरी घटनाओं में नहीं, बल्कि हमारे भीतर उठने वाले भावों में छिपी होती है। अर्थात् एक ही स्थिति में अलग-अलग परिणाम हालात में फ़र्क़ की वजह से नहीं, अपितु दृष्टि में फ़र्क़ की वजह से होता है। चलिए, इसी बात को हम एक कहानी से समझने का प्रयास करते हैं।
वर्षा ऋतु को समीप आता देख एक गुरु और उनके युवा शिष्य ने धार्मिक यात्रा को पूर्ण कर अपने गाँव पहुँचने का निर्णय लिया और गाँव-गाँव ईश्वर का नाम गाते, लोगों को प्रेम और जागरूकता का संदेश देते जब वे जंगल के पास बने अपने छोटे से आश्रय के निकट पहुँचे, तो दृश्य बदल चुका था। असल में पूर्व में आई तेज़ आँधी की वजह से उनकी झोपड़ी का आधा छप्पर उड़ चुका था। उसी समय आकाश में घिर आए बादलों को देख युवा शिष्य का मन विद्रोह से भर गया। व्यथित शिष्य आसमान की ओर देखते हुए बोला, “प्रभु! हम दिन-रात भक्ति करते हैं, प्रार्थना करते हैं, और बदले में हमें यह मिला? जो छल-कपट में जीते हैं, उन सभी के घर सुरक्षित हैं, और साधुओं का आश्रय उजड़ गया। अगर यही भक्ति का फल है, तो इसका अर्थ ही क्या?” वह अपनी बात पूरी कर पाता उसके पहले ही उसकी नजर अपने गुरु पर पड़ी। गुरु आकाश की ओर हाथ उठाए ज़मीन पर बैठे हुए थे और उनके मुख से कृतज्ञता के शब्द और आँखों से संतोष के आँसू बह रहे थे। वे धीरे-धीरे कह रहे थे, “प्रभु, तेरी करुणा अपार है। आँधी में पूरी झोपड़ी ले जाने की शक्ति थी, पर तूने आधी बचा ली। तेरा लाख-लाख धन्यवाद।”
दोस्तों, एक ही स्थान, एक ही घटना, एक ही परिस्थिति लेकिन दो अलग-अलग अनुभव। इसी से हम जीवन के सबसे गहरे सत्य को समझ सकते है। जीवन में घटने वाली घटनाएँ, परिस्थितियाँ, परिणाम आदि समान हो सकती हैं, पर उसका अर्थ हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है क्योंकि वह ख़ुद उसका अर्थ गढ़ता है। हेलेन किलर ने इस सत्य को अपने जीवन में जिया था। बचपन में दृष्टि और श्रवण शक्ति खोने के बाद वे चाहती तो जीवन भर शिकायत कर सकती थी। लेकिन उन्होंने ऐसा करने के स्थान पर कहा, “जब एक द्वार बंद होता है, तो दूसरा खुलता है; बस हम अक्सर बंद द्वार को ही देखते रहते हैं।”
हेलेन किलर के लिए परिस्थिति नहीं बदली थी, पर उनकी बदली हुई दृष्टि ने उनका जीवन बदल कर असाधारण बना दिया था।ऐसा ही कुछ गुरु और शिष्य के साथ भी हुआ। रात होते ही दोनों उसी आधी छत वाली झोपड़ी में लेट गए। एक ओर शिष्य जहाँ पूरी रात यह सोच करवटें बदलता रहा, “कब वर्षा आ जाए, क्या भरोसा? यह कोई सुरक्षित जगह तो है नहीं।” असल में उसका मन अशांत था, इसलिए नींद उससे कोसों दूर थी। वहीं दूसरी ओर गुरु शांत भाव से सोए हुए थे। भोर में जब उनकी आँख खुली, तो खुले छप्पर से चाँदनी भीतर उतर रही थी। गुरु मुस्कुराए और बोले, “यदि हमें पहले पता होता कि आधा छप्पर हटने से आकाश इतना निकट आ जाएगा, तो हम स्वयं ही इसे बहुत पहले हटा देते। ईश्वर, हम कितनी बार तेरे चाँद को अपने छप्पर से रोकते रहे, हमें पता ही न था।”
दोस्तों, ठीक ऐसे ही जीवन कई बार हमारे छप्पर हटा देता है, याने वह हमें हमारी सुरक्षा, हमारी योजना, हमारे भरोसे से दूर कर देता है और हमें ऐसा एहसास करवाता है जैसे सब कुछ टूट गया है, पीछे छूट गया है। लेकिन अक्सर यही टूटना और पीछे छूटना हमें नई ऊंचाइयों पर ले जाता है। याद रखियेगा, ईश्वर के प्रति समर्पण रखने याने स्वीकार्यता के भाव के साथ जीने का अर्थ हार मानना नहीं है। समर्पण का अर्थ है, जो घटा है, उसमें भी अर्थ देख पाना। दोस्तों, अगर आप भी जीवन में ऊंचाइयों को छूना चाहते हैं तो आज स्वयं से पूछिए, “आप अपने जीवन की आँधियों को किस भाव से देख रहे हैं? शिकायत की नज़र से या कृतज्ञता की दृष्टि से?” क्योंकि जहाँ संतोष जन्म लेता है, वहीं शांति उतरती है और जहाँ शांति होती है, वहीं जीवन का सच्चा कल्याण संभव होता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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