संयम, विवेक और संतुलन के साथ जियें जीवन !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 3 days ago
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Jan 31, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन में कई बातें ऐसी होती है जिसे सामान्यतः हम सब ‘भलमनसाहत’ मान कर अपनाते हैं, लेकिन बीतते समय के साथ हमें एहसास होता है कि वह भलमनसाहत नहीं ‘झूठी भावुकता’ या दिखावटी अपनापन था। जब तक हम इसे समझ पाते हैं तब तक स्थिति हमारे लिए अभिशाप बन जाती है। हाँ, यह भी सही है कि भावुक होना अच्छा है, दूसरे जीव पर दया दिखाना महानता है, हर बात पर पिघल जाना इंसानियत है। लेकिन साथ ही हमें यह भी याद रखना होगा कि बिना विवेक की भावुकता और बिना संयम का क्रोध, दोनों ही जीवन को तोड़ देते हैं।
यहाँ यह भी याद रखना आवश्यक है कि उपरोक्त बात हर इंसान के लिए समान रूप से लागू होती है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ज़िंदगी में कई बार ऐसा भी होता है जब सामने वाला व्यक्ति क्रोध, तैश और ईर्ष्या से भरा होता है। इस स्थिति में उसका स्वर ऊँचा होगा, शब्द तीखे होंगे, और व्यवहार असंयमित। ऐसे क्षणों में यदि हम भी उसी आग में आग डाल दें, तो रिश्ते, संवाद और सम्मान, सब जलकर राख हो जाते हैं। याद रखिएगा, क्रोध आग की तरह होता है। अगर दोनों ओर से हवा मिले, तो वह विकराल हो जाता है। लेकिन इसके विपरीत अगर एक ओर से शांति हो, तो आग अपने-आप बुझने लगती है। इसलिए ही कहा जाता है कि आवेश के क्षण में बुद्धि पंगु हो जाती है। उस समय मनुष्य सही-गलत, उचित-अनुचित का भेद भूल जाता है और कई बार गुस्से में ऐसे शब्द बोल जाता है, जिन्हें जीवन भर वापस नहीं लिया जा सकता है। इसलिए जब सामने वाला उत्तेजित हो, तब शांत रहना कमजोरी नहीं सबसे बड़ी ताकत है।
इस सत्य को इतिहास में अब्राहम लिंकन के जीवन से समझा जा सकता है। वे अमेरिका के महान राष्ट्रपति थे। उनके पास प्रतिदिन आलोचनाओं, अपमानजनक पत्रों और तीखे आरोपों की बाढ़ आती थी। कई बार वे क्रोध में जवाब लिख देते थे, लेकिन भेजते नहीं थे। वे उन पत्रों को अपनी मेज़ की दराज़ में रख देते थे। कभी-कभी दिनों बाद पढ़ते और फाड़ देते। लिंकन कहा करते थे, “अगर मैं गुस्से में लिखे पत्र भेज दूँ, तो शायद क्षणिक संतोष मिलेगा, लेकिन जीवन भर का पछतावा भी।” दोस्तों, यही ठंडे दिमाग की शक्ति है।
अब आइए बात करें दूसरी सीमा की, अत्यधिक भावुकता। कई बार हम दया, सहानुभूति या करुणा में इतने बह जाते हैं कि अपनी मर्यादा, अपनी सीमाएँ और अपनी वास्तविक क्षमता भूल जाते हैं। भावुकता में बड़े-बड़े वादे कर देते हैं, दान के, मदद के, जिम्मेदारियों के और बाद में न उन्हें निभा पाते हैं, न खुद को सम्भाल पाते हैं। यह दया नहीं, झूठी भावुकता होती है। दीन-दुखियों की सहायता करना पुण्य है, लेकिन अपनी क्षमता से बाहर जाकर खुद को संकट में डाल लेना बुद्धिमानी नहीं।
सच यह है दोस्तों, अत्यधिक कठोरता भी गलत है, और अत्यधिक कोमलता भी। जो बहुत कठोर होता है, उससे लोग डरते हैं, दूर रहते हैं और जो बहुत भावुक होता है, उसे लोग इस्तेमाल करना सीख लेते हैं। जीवन की कला इन दोनों के बीच संतुलन में है। न इतने सख्त बनिए कि कोई आपसे सलाह न लेना चाहे, और न इतने नरम कि आपका अस्तित्व ही मिट जाए।
दोस्तों, आज का संदेश बहुत स्पष्ट है, दूसरों से व्यवहार करते समय ठंडा दिमाग और जागरूक हृदय रखें। क्रोध आए तो ठहरें और भावुकता आए तो गंभीरता से सोचें क्योंकि झूठी भावुकता आपको महान नहीं बनाती, वह आपको कमज़ोर बनाती है और जो व्यक्ति संयम, विवेक और संतुलन के साथ चलता है, वही जीवन में सम्मान, शांति और स्थिरता पाता है। यही सच्ची समझदारी है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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