मुक्ति चाहते हैं तो अपनायें यह सूत्र…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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Feb 2, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज हम एक ऐसे विषय पर चर्चा करेंगे जो हमें बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से बदलकर जीवन को नया रूप देगी। अक्सर आपने सुना होगा कि जीवन का लक्ष्य मुक्ति या मोक्ष पाना है और मुक्ति हमें इस लोक को छोड़ने के बाद मिलती है। याने हम अक्सर मुक्ति को किसी और लोक, किसी और अवस्था से जोड़ कर देखते हैं, जबकि सत्य यह है कि आप मुक्ति इस जन्म में और इसी क्षण में पाना शुरू कर सकते हैं। जी हाँ दोस्तों, इसके लिए बस आपको सबसे पहले अपनी देह से, फिर देह के संबंधों से और दुनिया की स्मृतियों से मुक्त होना होगा। जैसे ही आप इस विचार के साथ जीवन में आगे बढ़ना शुरू करते हैं जीवनमुक्ति अपने आप घटित होने लगती है।
दोस्तों, विचार थोड़ा गंभीर और गहरा है लेकिन यकीन मानियेगा यह ना सिर्फ़ स्वीकारने बल्कि अपनाने योग्य है। चलिए, थोड़ा विस्तार से इस पर चर्चा कर लेते हैं। हममें से अधिकतर लोग यह मानते हैं कि “मैं यह शरीर हूँ।”, बस यहीं से बंधन शुरू होता है। देह से अपनी पहचान बनाते ही हमारे भीतर तुलना शुरू हो जाती है और हम ख़ुद को सुंदर या कुरूप, मजबूत या कमज़ोर, युवा अथवा वृद्ध आदि से जोड़ने लगते हैं।
जब आप “मैं यह शरीर हूँ!” के भाव के साथ आगे बढ़ते हैं तब आप इस देह के संबंधों को अपने साथ जोड़ने लगते हैं और जीवन में ‘मेरा’ का भाव आ जाता है। याने आप ख़ुद को ‘मेरा’, ‘मेरा परिवार’, ‘मेरी प्रतिष्ठा’, ‘मेरी पहचान’ आदि से जोड़ने लगते हैं। इसके बाद अगला बंधन पुरानी दुनिया की स्मृतियाँ को होता है। याने आप पुराने अनुभवों से अपने वर्तमान को जोड़ कर या यूँ कहूँ बाँध कर देखने लगते हैं। याने पूर्व में हुआ अपमान या सम्मान, अधूरी इच्छाएँ, पुराने डर, पुरानी हार या जीत आपके वर्तमान को प्रभावित करने लगती हैं। दोस्तों, अगर आप थोड़ा गहराई से देखेंगे तो पायेंगे कि यह तीन बातें मिलकर हमारे मन को पूरी तरह जकड़ लेती है।
इस सत्य को भगवान रमण महर्षि ने मात्र सोलह साल की उम्र में उस वक्त पहचाना था, जब उनके भीतर मृत्यु का भय उठा था।
उस क्षण उन्होंने इस भय का सामना करते हुए ख़ुद से प्रश्न किया था, “यदि यह शरीर मर जाए, तो ‘मैं’ कौन हूँ?” उन्होंने देह को देखा, पर स्वयं को देह नहीं माना। उस एक प्रश्न ने उन्हें देह-बोध से मुक्त कर दिया। इस ज्ञान को पाने के लिए उन्होंने जंगल में जाकर कोई तपस्या नहीं की, उन्होंने तो बस जाग्रत रहते हुए उस पल को जिया, ख़ुद से प्रश्न किया, मनन किया और इससे जीते-जी मुक्त हो गए। इसलिए ही वे कहते थे, “तुम देह नहीं हो। देह आती-जाती है। तुम वह हो जो देह को जानता है।”
दोस्तों, ‘मेरा’ के भाव से मुक्ति का अर्थ संबंधों से भागना नहीं है। मुक्ति का अर्थ, आसक्ति से मुक्त होना है। आप परिवार में रहें, समाज में रहें, कर्म करें, लेकिन भीतर हर पल सजगता के साथ यह स्वीकारें कि, “मैं इन सबका स्वामी नहीं, साक्षी हूँ।” जब यह समझ आती है, तो अपेक्षाएँ ढीली पड़ने लगती हैं। आहत होने की तीव्रता कम हो जाती है और मन हल्का होने लगता है।
अब हम इसके सबसे कठिन चरण की ओर आते हैं। जीवन में पुरानी दुनिया की स्मृतियों से मुक्त होना सबसे कठिन है। सामान्यतः हम वर्तमान में रहते हुए भी अतीत का बोझ ढोते रहते हैं। किसने क्या कहा था, किसने क्या नहीं किया, मुझे क्या मिलना चाहिए था, ये सब स्मृतियाँ हमें अपने आज से काट देती हैं। याद रखियेगा, जब तक अतीत पकड़ में है, तब तक वर्तमान में स्वतंत्रता नहीं आ सकती।
जीवनमुक्ति कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है। यह कोई पुरस्कार नहीं जो अंत में मिलेगा। जीवनमुक्ति एक अनुभव है, जिसे आप यहाँ और अभी अनुभव कर सकते हैं। जब आप देह का उपयोग करते हैं, लेकिन देह बनते नहीं, जब आप संबंध निभाते हैं, लेकिन उनमें खोते नहीं और जब आप स्मृतियों को जानते हैं, लेकिन उनसे संचालित नहीं होते, उसी क्षण आप मुक्त हो जाते हैं।
दोस्तों, अगर आप मेरे इस विचार से सहमत हों तो अपने जीवन को देखिए और ईमानदारी से देखते हुए आज ख़ुद से निम्न प्रश्न कीजिएगा:
१) क्या मैं अपने शरीर की सीमाओं से परे खुद को महसूस कर पा रहा हूँ?
२) क्या मेरे संबंध प्रेम से चल रहे हैं या आसक्ति से?
३) क्या मेरी सोच आज में है या बीते कल में उलझी हुई है?
अंत में इतना ही कहूँगा कि मुक्ति का रास्ता बाहर नहीं जाता, वह भीतर उतरता है और जब यह उतरना शुरू होता है, तो जीवन बोझ नहीं, उत्सव बन जाता है। याद रखिएगा दोस्तों, जो व्यक्ति जीते-जी मुक्त हो जाता है, उससे मृत्यु कुछ छीन नहीं सकती और यही सच्ची जीवनमुक्ति है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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