बने रहें एक अच्छे शिष्य…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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Feb 1, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज मैं आपसे एक ऐसी बात साझा करना चाहता हूँ जो ज्ञान से नहीं, विनम्रता से जन्म लेती है। अक्सर जीवन में गुरु को विशेष ज्ञानी व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है। लेकिन सच्चाई इस धारणा के इतर है, अगर आप शिष्य बने रहने का साहस रखते हैं तो जीवन ही सबसे बड़ा गुरु है। चलिए, इस बात को हम एक प्यारी सी कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
बात कई साल पुरानी है, गाँव के बाहरी इलाक़े में एक अत्यंत प्रभावशाली महंत रहा करते थे। एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा, “स्वामी जी, आपके गुरु कौन हैं?” महंत मुस्कुराए और बोले, “जीवन की इस यात्रा में अभी तक मुझे हज़ारों गुरु मिले हैं। लेकिन आज मैं तुम्हें अपने तीन गुरुओं के बारे में बताऊँगा—एक चोर, एक कुत्ता और एक छोटा बच्चा।” शिष्य चकित रह गया। महंत ने बताया—एक बार वे रास्ता भटक गए और आधी रात को एक गाँव पहुँचे। सभी दरवाज़े बंद थे। तभी उन्होंने एक व्यक्ति को दीवार में सेंध लगाते देखा। वह चोर था। उसने साफ़ कहा—“मैं चोर हूँ, लेकिन अगर आप चाहें तो मेरे साथ ठहर सकते हैं।” महंत एक रात के लिए रुके, लेकिन एक महीना ठहर गए। हर रात चोर निकलता और लौटकर कहता—“आज कुछ नहीं मिला, लेकिन भगवान ने चाहा तो कल ज़रूर मिलेगा।” वह कभी निराश नहीं होता था। महंत बोले—“जब मेरी साधना में वर्षों तक कुछ नहीं हुआ और मैं हताश होने लगा, तब मुझे उसी चोर की याद आती, जो असफलता में भी उम्मीद नहीं छोड़ता था। उसने मुझे धैर्य और आशा सिखाई।”
दूसरा गुरु—एक कुत्ता। तेज़ गर्मी, प्यास से व्याकुल कुत्ता नदी के पास पहुँचा। पानी में उसने अपनी परछाईं देखी और डर गया। कई बार पीछे हटा, लेकिन प्यास ने उसे लौटने पर मजबूर किया। अंततः उसने डर के बावजूद छलांग लगा दी—और डर गायब हो गया। महंत बोले—“उस कुत्ते ने मुझे सिखाया कि डर के रहते भी कदम उठाना ही साहस है। जो छलांग नहीं लगाता, वह प्यासा ही रह जाता है।”
तीसरा गुरु—एक छोटा बच्चा। बच्चा जलती मोमबत्ती लेकर मंदिर जा रहा था। महंत ने मज़ाक में पूछा—“क्या तुम बता सकते हो, यह ज्योति कहाँ से आई?” बच्चे ने मोमबत्ती बुझाकर कहा—“आपने इसे जाते देखा, अब बताइए—यह कहाँ गई?”
उस क्षण महंत का अहंकार टूट गया। उन्होंने जाना कि सच्चा ज्ञान प्रश्नों से नहीं, खुलेपन से आता है।
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि शिष्य होना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। इसी भाव को हमने स्वामी विवेकानंद के जीवन में भी देखा। वे कहते थे, “मैं हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखता हूँ।” उन्होंने साधुओं से भी सीखा, मछुआरों से भी, और यहाँ तक कि पश्चिमी विद्वानों से भी। उनका महान व्यक्तित्व इसी कारण बना, क्योंकि वे अंत तक सीखने वाले शिष्य बने रहे। आज समस्या यह नहीं है कि हमारे पास ज्ञान कम है, समस्या यह है कि हम सीखना बंद कर देते हैं। हम आलोचना को अपमान मान लेते हैं। सलाह को हस्तक्षेप समझ लेते हैं और फिर वही गलतियाँ दोहराते रहते हैं। याद रखिए, जीवन का हर क्षण आपको कुछ सिखाने आया है। हर व्यक्ति—चाहे वह छोटा हो या बड़ा—आपका गुरु हो सकता है। शर्त सिर्फ़ इतनी है कि आपका मन खुला हो, अहंकार झुका हो। आज स्वयं से पूछिए, क्या मैं शिष्य बना हुआ हूँ, या सिर्फ़ ज्ञानी होने का भ्रम पाल रहा हूँ? क्योंकि जो व्यक्ति जीवन भर शिष्य बना रहता है, वही अंत में सच में गुरु बनता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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