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इस दीपावली, इच्छाओं का नहीं, संतोष का दीप जलाएं !!!

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
10 minutes ago
3 min read

Nov 8, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, सर्वप्रथम तो आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!


हर वर्ष की तरह इस साल भी हम सभी ने दीपावली आते ही अपने घरों की सफाई कड़ी होगी और पुराने सामान को हटाया होगा, नए कपड़े खरीदे होंगे और घर को रंगबिरंगी रोशनी से सजाया होगा। हम सभी चाहते हैं कि दीपावली पर हमारा घर पहले से अधिक सुंदर और भव्य दिखाई दे। लेकिन हम कभी यह नहीं सोचते कि दीपावली पर अपने मन की भी थोड़ी सफाई कर लें और उन इच्छाओं को भी पहचानें, जिन्होंने हमारे भीतर असंतोष का अंधेरा पैदा कर रखा है।


जी हाँ दोस्तों, हम अक्सर अपनी ग़रीबी का आकलन अपनी जेब देखकर और अपनी समृद्धि का अंदाजा अपनी संपत्ति से लगाते हैं। लेकिन क्या वास्तव में अमीर होने का अर्थ अधिक धन, बड़ा घर और बेहतर सुविधाएं जुटाना है? या फिर अमीरी का कोई ऐसा पैमाना भी है, जिसका संबंध हमारे मन की संतुष्टि से है? बात थोड़ी गहरी है, लेकिन समझने और अपनाने योग्य है। मनुष्य आवश्यकताओं से नहीं, बल्कि अपनी असीमित इच्छाओं से दरिद्र होता है। आवश्यकताएं सीमित होती हैं, लेकिन इच्छाओं का कोई अंत नहीं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। जो कल हमारी उपलब्धि थी, आज हमारी जरूरत बन जाती है। धीरे-धीरे हम सुविधाएं तो बढ़ाते जाते हैं, लेकिन संतुष्टि खोते जाते हैं। इस दुनिया में जाने कितने ही लोग हैं जिनके पास दुनिया भर की तमाम सुविधाएं हैं, लेकिन वे फिर भी प्रसन्न नहीं हैं। उनके पास धन है, प्रतिष्ठा है, अच्छे संबंध हैं, लेकिन मन में एक खालीपन है। शायद इसलिए कि उन्होंने जीवन में बहुत कुछ हासिल तो कर लिया, लेकिन जो हासिल किया उसका आनंद लेना नहीं सीखा।


जीवन-दर्शन के इस सूत्र को हम भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा के एक ख़ूबसूरत प्रसंग से समझने का प्रयास करते हैं। सुदामा ग़रीब थे, उनके पास धन-संपत्ति नहीं थी, लेकिन उनके मन में पाने की कोई आकांक्षा भी नहीं थी। वे बिना कोई याचना लिए अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे थे। उनके पास देने के लिए भी सिर्फ़ मुट्ठी भर चावल थे, लेकिन उस भेंट में प्रेम, आत्मीयता और निष्काम भाव की अपार संपत्ति थी।


इन्हीं भावों के कारण श्रीकृष्ण ने प्रेम और आत्मीयता से उनका स्वागत किया। यह घटना हमें याद दिलाती है कि वास्तविक समृद्धि का मूल्य धन से नहीं, भावनाओं से तय होता है। सुदामा का प्रसंग हमें सिखाता है कि जिसके भीतर अपेक्षाओं का बोझ नहीं, उसके पास प्रेम और संतोष की सबसे बड़ी पूंजी होती है।


दोस्तों, मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि हम सपने देखना छोड़ दें, लक्ष्य बनाना बंद कर दें या जीवन में प्रगति की इच्छा न रखें। आगे बढ़ना और बेहतर जीवन के लिए प्रयास करना जरूरी है। लेकिन अपनी प्रसन्नता को हर नई उपलब्धि के साथ बांध देना उचित नहीं है। इसलिए इस दीपावली एक छोटा-सा संकल्प लें और अपने घर के साथ अपने मन को भी रोशन करें। दूसरों से तुलना करने की आदत कम करें, जो मिला है उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और अपनी खुशियों को केवल नई खरीदारी या नई उपलब्धियों पर निर्भर न रहने दें।


याद रखिएगा, इच्छाएँ पूरी होने से सुविधाएं बढ़ती हैं, लेकिन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने से सुकून बढ़ता है। जिसके पास संतोष है, वह सीमित साधनों में भी समृद्ध है और जिसके भीतर असंतोष है, वह अपार संपत्ति के बीच भी दरिद्र हो सकता है। इसलिए दोस्तों, इस दीपावली घर में दीप जलाने के साथ-साथ अपने भीतर भी संतोष, प्रेम, कृतज्ञता और उदारता के दीप को प्रज्वलित करें क्योंकि जीवन बाहरी रोशनी से नहीं, बल्कि भीतर की समृद्धि से रोशन होता है।


दोस्तों, आपका जीवन सुख, शांति और संतोष की रोशनी से सदैव जगमगाता रहे। दीपावली की इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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