ऊर्जा काम में नहीं भावनाओं में छिपी होती है…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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Mar 21, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आपने निश्चित तौर पर कभी ना कभी महसूस किया होगा कि कई बार हमें छोटा सा काम भी बहुत थका देता है, और कभी पूरा दिन काम करने के बाद भी हम भीतर से ऊर्जावान और उत्साहित महसूस करते हैं। मेरी नजर में यह फर्क काम की मात्रा का नहीं, बल्कि मन की स्थिति का होता है। जब हम किसी काम को मजबूरी में करते हैं, तो वह छोटा सा कार्य भी भारी लगने लगता है। इसकी मुख्य वजह हमारे मन का उस कार्य से ना जुड़ना है और जब किसी कार्य से हमारा मन नहीं जुड़ता तब हमारा शरीर भी उस कार्य के लिए हमारा साथ नहीं देता और फिर धीरे-धीरे हमारी ऊर्जा ख़त्म होने लगती है।
इसके विपरीत, जब वही काम हम रुचि, उद्देश्य और उत्साह के साथ करते हैं, तो हम थकने के स्थान पर और अधिक जीवंत या ऊर्जावान महसूस करने लगते हैं। दोस्तों, यही वो अंतर है जिसकी वजह से एक ही कार्य दो लोगों के लिए अलग-अलग अनुभव बन जाता है। याने एक ही कार्य किसी के लिए बोझ, तो किसी के लिए आनंद बन जाता है। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ आनंद और थकान दोनों का ही संबंध काम से कम भावनाओं से ज्यादा होता है।
दोस्तों, इसका अर्थ हुआ अगर मन नकारात्मक है; शिकायतों, तुलनाओं और मजबूरियों से भरा हो, तो इंसान की ऊर्जा जल्दी ख़त्म हो जाती है और इसके विपरीत अगर मन सकारात्मक हो याने वह उद्देश्य, कृतज्ञता और सीखने की भावनाओं से भरा हुआ हो तो इंसान ऊर्जा से भर जाता है। याने किसी कार्य को शिकायत, तुलना और मजबूरी के कारण किया जाये तो वह थकाएगा और अगर उसी कार्य को किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए, कृतज्ञता या सीखने के भाव से किया जायेगा तो वो आपको ऊर्जा से भर देगा।
दोस्तों, जीवन के इस अद्भुत सत्य को पहचान कर ही थॉमस अल्वा एडिसन महान बने। वे प्रतिदिन 18-18 घंटे अपनी लैब में नए-नए प्रयोग किया करते थे और जब लोग उनसे पूछते थे कि “इतना काम करने के बाद भी आप थकते क्यों नहीं?” तो वे मुस्कुराकर कहते थे,“मैं काम नहीं कर रहा, मैं तो बस अपने जुनून को जी रहा हूँ।” यही वो कारण था, जिसकी वजह से हजारों असफल प्रयोगों के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। असल में उनके लिए वह काम बोझ नहीं, बल्कि एक उद्देश्य था, कुछ नया खोजने का, दुनिया को बेहतर बनाने का।
दोस्तों, दुनिया में हर इंसान के पास काम लगभग समान रहता है, लेकिन बदले हुए दृष्टिकोण के कारण इंसान का अनुभव बदल जाता है। याने जब आप किसी काम को सिर्फ “करना है” सोचकर करते हैं, तो वह आपको थका देता है। लेकिन जब आप उसे “मैं क्यों कर रहा हूँ” समझकर करते हैं, तो वही काम आपको शक्ति देता है। इस आधार पर कहा जाए तो जीवन में ऊर्जा बनाए रखने का सबसे सरल सूत्र है, “अपने काम को केवल जिम्मेदारी न मानिए, उसे अर्थ दीजिए।” अगर आप काम कर रहे हैं, तो सोचिए, “मैं किसका जीवन बेहतर बना रहा हूँ? मैं क्या सीख रहा हूँ? मैं किस दिशा में बढ़ रहा हूँ? दोस्तों, जैसे ही काम के पीछे उद्देश्य जुड़ता है, थकान कम होने लगती है और ऊर्जा बढ़ने लगती है।
याद रखिएगा, हमारा शरीर काम से नहीं, मन की नकारात्मकता से थकता है और मन तब तक थकता है, जब तक उसे अपने काम में अर्थ नहीं दिखता। इसलिए आज से एक छोटा सा बदलाव कीजिए, काम को बदलने के स्थान पर अपनी सोच बदलिए और मजबूरी की जगह कृतज्ञता लाइए; शिकायत की जगह उद्देश्य लाइए। ऐसा करते ही आप देखेंगे कि वही जीवन, वही काम, वही दिन, अब आपको बोझ नहीं लगेगा, बल्कि एक उत्सव जैसा महसूस होगा क्योंकि सच यही है, ऊर्जा काम में नहीं, आपके दृष्टिकोण में छिपी होती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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