एक गलती से किसी का पूरा व्यक्तित्व मत आँकिए !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 12 hours ago
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June 30, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, एक इंसान के तौर पर अक्सर हम विरोधाभासी जीवन जीते हैं। उदाहरण के लिए हम चाहते हैं कि लोग हमारी अच्छाइयों को याद रखें और हमारी गलतियों के लिए हमें माफ कर दें और उन्हें भूल जायें। जबकि हम स्वयं एक छोटी सी गलती के कारण दूसरों की वर्षों तक की गई सारी अच्छाइयों को भूल जाते हैं और एक छोटी-सी भूल के आधार पर उनके पूरे व्यक्तित्व का निर्धारण कर देते हैं। इतना ही नहीं कई बार तो हम ग़लतियों को देखने तक सीमित नहीं रहते, हम तो उसके पीछे की मंशा भी ख़ुद ही तय कर लेते हैं। जैसे, “ऐसा उसने जानबूझकर किया होगा…”, “वह तो ऐसा ही है, उस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता…”, “वह तो हमेशा ही ऐसा करता है…” आदि।
दोस्तों, यहाँ मैं पूछना चाहूँगा कि ऐसे टैग देते वक्त हमें क्या सचमुच किसी के मन की पूरी कहानी पता होती है? शायद नहीं! मेरा तो मानना है कि₹ किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी एक भूल से नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन, उसके प्रयासों और उसके निरंतर विकास से होना चाहिए। सोच कर देखियेगा, यदि माता-पिता अपने बच्चे को एक गलती के कारण असफल मान लें, तो शायद वह कभी आत्मविश्वास से खड़ा न हो सके। इसी तरह अगर शिक्षक एक परीक्षा के कम अंकों से विद्यार्थी की क्षमता तय कर दे, तो अनेक प्रतिभाएँ जन्म लेने से पहले ही दब जाएँगी और यदि कोई संस्था अपने कर्मचारी को एक भूल के कारण हमेशा के लिए अयोग्य मान ले, तो वह एक अच्छे इंसान और योग्य सहयोगी को खो सकती है।
दोस्तों, याद रखियेगा महान लोग पूर्णता नहीं खोजते, बल्कि प्रगति देखते हैं। वे यह नहीं पूछते कि “तुमसे गलती क्यों हुई?” वे तो पूछते हैं, “क्या तुमने उस गलती से कुछ सीखा?” यही दृष्टिकोण उन्हें, उनके रिश्तों को मजबूत और नेतृत्व को महान बनाता है। वैसे सही मायनों में देखा जाये तो यह इंसानियत की पहचान भी है। याद रखियेगा, जब हम दूसरों के प्रति कठोर निर्णय लेते हैं, तो वह सामने वाले से अधिक हमारे अपने चरित्र का परिचय देता है। उदार व्यक्ति दूसरों की कमजोरियों के पीछे छिपे संघर्ष को देखने का प्रयास करता है। वह किसी की एक भूल से पूरी कहानी नहीं लिखता क्योंकि वह जानता है कि जीवन स्वयं भी हर दिन हमें दूसरा अवसर देता है।
दोस्तों, इसी प्रकार हमारी अधिकांश परेशानियाँ भी परिस्थितियों से कम और उनके बारे में हमारी सोच से अधिक पैदा होती हैं। सहमत ना हो तो जरा इस प्रश्न का जवाब दीजिए, एक ही घटना दो लोगों के जीवन में अलग-अलग परिणाम क्यों देती है? चलिए मैं ही बताता हूँ, कोई भी घटना दो लोगों के लिए समान हो सकती है, लेकिन उसके प्रति उनकी सोच, उनका नजरिया अलग-अलग परिणाम देता है। यदि हम हर समस्या को अंत मान लेंगे, तो निराशा हमारा भविष्य बन जाएगी। लेकिन यदि हर चुनौती को सीख मानेंगे, तो वही परिस्थिति हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करेगी। इसलिए ही मैं हमेशा कहता हूँ, “अतीत की गलतियों का बोझ और भविष्य की चिंताओं का डर, ये दोनों मिलकर वर्तमान की खुशियाँ छीन लेते हैं।” दोस्तों, अगर ख़ुश रहना चाहते हैं तो स्वयं को बार-बार वर्तमान में लौटाइए। जो बीत गया, उससे सीख लीजिए; जो आने वाला है, उसके लिए तैयारी कीजिए; लेकिन जीना केवल वर्तमान में सीखिए।
दोस्तों, अगर यह मुश्किल लग रहा है तो याद रखिए, ईश्वर ने हमें जीवन दिया है, इसलिए विश्वास भी दिया है। स्वयं पर विश्वास रखिए। अपने कर्म पर विश्वास रखिए और उस शक्ति पर भी विश्वास रखिए जो हर अँधेरी रात के बाद नई सुबह लेकर आती है। अंत में केवल इतना याद रखिएगा, दूसरों का मूल्यांकन उनकी एक गलती से और अपने पूरे जीवन का मूल्यांकन अपनी एक असफलता से मत कीजिए क्योंकि इंसान की पहचान उसकी ठोकरों से नहीं, बल्कि हर ठोकर के बाद फिर से उठ खड़े होने के साहस से होती है और जीवन की सबसे सुंदर दृष्टि वही है, जो लोगों में उनकी कमियाँ नहीं, उनकी संभावनाएँ देखना सीख जाती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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