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राष्ट्र तब बदलता है जब…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 21 hours ago
  • 3 min read

June 29, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इस दुनिया में ज्यादातर लोग समस्याओं पर चर्चा करते हैं। किसी को शिक्षा के गिरते स्तर की चिंता है, तो कोई नशे की बढ़ती प्रवृति को देख हैरान है। कुछ सामाजिक कुरीतियों से परेशान हैं, तो किसी को विवाह में बढ़ते खर्च या अपव्यय की चिंता है। कुल मिलाकर कहा जाए तो संसाधनों की कमी या उसका दुरुपयोग या फिर अधूरे कार्य इस चर्चा का केंद्रबिंदु होते हैं और चर्चा के अंत में इन सभी समस्याओं का दोष सरकार को दे दिया जाता है। दोष देने की प्रवृति वाले ऐसे सभी लोगों से मैं सिर्फ़ एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। क्या समाज की समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी केवल सरकार की है? या फिर समाज का प्रत्येक जागरूक नागरिक भी इस परिवर्तन का भागीदार है?


दोस्तों, यकीन मानियेगा किसी भी राष्ट्र का निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों से होता है। कल्पना कीजिए, किसी गाँव में आठ व्यक्तियों में से केवल एक व्यक्ति भी शिक्षित हो और वह प्रतिदिन कुछ समय निकालकर बच्चों या वयस्कों को पढ़ाना शुरू कर दे, तो धीरे-धीरे पूरे गाँव का भविष्य बदल सकता है। इतिहास गवाह है कि बड़े परिवर्तन हमेशा छोटे प्रयासों से शुरू हुए हैं। एक दीपक अंधकार को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, लेकिन वह अंधकार के विरुद्ध संघर्ष अवश्य शुरू कर देता है।


हाँ! यह बात बिल्कुल सही है कि आज भी हमारे समाज में अनेक ऐसी परंपराएँ और आदतें हैं जो हमारी प्रगति में बाधा बन रही हैं। विशेष रूप से विवाह और सामाजिक आयोजनों में होने वाला अनावश्यक खर्च, जिसे सामान्य लोग ‘समाज क्या कहेगा…’, के डर से करते है और इसी वजह से कई परिवार वर्षों तक कर्ज के बोझ तले दबे रहते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता बेटियों के जन्म पर चिंतित हो जाते हैं क्योंकि उनके मन में भविष्य के विवाह खर्च की चिंता बैठी होती है। सोचिए, यदि समाज मिलकर सादगी पूर्ण विवाह को सम्मान देना शुरू कर दे, तो कितने परिवार आर्थिक और मानसिक तनाव से मुक्त हो सकते हैं। याद रखियेगा, वास्तविक प्रतिष्ठा खर्च में नहीं, संस्कारों में होती है।


दोस्तों, एक और चुनौती है जो चुपचाप हमारे समाज की ऊर्जा और संसाधनों को निगल रही है—नशे की बढ़ती प्रवृत्ति। सिगरेट, तंबाकू, शराब और अन्य व्यसनों पर हर वर्ष अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं। यह केवल पैसे का नुकसान नहीं है, यह स्वास्थ्य का भी नुकसान है। यह परिवारों की खुशियों का भी नुकसान है। यह राष्ट्र की उत्पादकता का भी नुकसान है। कल्पना कीजिए, यदि यही धन शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार सृजन पर लगाया जाए, तो देश की तस्वीर कितनी बदल सकती है।


ऐसे अनेकों बदलाव के लिए केवल कानून के भरोसे बैठना पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए तो आवश्यकता है सामाजिक जागरूकता की; सामूहिक संकल्प की और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है स्वयं उदाहरण बनने की। दोस्तों, किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसके विचारशील और जिम्मेदार नागरिक होते हैं, जो केवल समस्याएँ नहीं गिनाते, बल्कि समाधान का हिस्सा बनते हैं। जो केवल शिकायत नहीं करते, बल्कि पहल करते हैं। जो केवल आलोचना नहीं करते, बल्कि योगदान देते हैं। आज देश को ऐसे ही लोगों की आवश्यकता है। ऐसे शिक्षक जो शिक्षा को आंदोलन बना दें। ऐसे माता-पिता जो संस्कारों को प्राथमिकता दें। ऐसे युवा जो नशे के स्थान पर राष्ट्र निर्माण को चुनें और ऐसे नागरिक जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने दायित्वों को भी समझें।


अंत में इतना ही ओर कहूँगा कि समाज की सबसे बड़ी समस्याएँ संसाधनों की कमी से नहीं, जागरूकता और सहभागिता की कमी से पैदा होती हैं। जिस दिन हम यह समझ जाएंगे कि “देश” कोई अलग इकाई नहीं, बल्कि हम सबका सामूहिक स्वरूप है, उसी दिन परिवर्तन की शुरुआत हो जाएगी क्योंकि राष्ट्र तब नहीं बदलता जब केवल सरकार काम करती है। राष्ट्र तब बदलता है जब उसके नागरिक जागते हैं, जुड़ते हैं और जिम्मेदारी उठाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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