स्वयं अच्छा बन पाना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 4 hours ago
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June 28, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, पिछले कुछ समय से मैंने लोगों को अक्सर कहते या यूँ कहूँ शिकायत करते सुना है, “आजकल लोग पहले जैसे नहीं रहे हैं और दुनिया पूरी तरह बदल गई है। आजकल ना तो रिश्तों में सच्चाई नजर आती है और ना ही लोगों में ईमानदारी। इसी वजह से आजकल समाज में अच्छे और सच्चे लोगों का मिलना मुश्किल हो गया है।” दोस्तों, इस विषय में मेरा मत थोड़ा अलग है ऐसे सभी लोगों से मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि जिस दुनिया को वे देख रहे हैं, कहीं वह उनके अपने विचारों और दृष्टिकोण का प्रतिबिंब तो नहीं? ऐसा मैं सिर्फ़ जीवन के एक गहरे सत्य की वजह से कह रहा हूँ। जिसके अनुसार यह संसार वैसा नहीं दिखता जैसा वह है, बल्कि वैसा दिखता है जैसे हम हैं। याने हमारी दृष्टि ही हमारी सृष्टि का निर्माण करती है। चलिए, इसे महाभारत के एक प्रसिद्ध प्रसंग से समझने का प्रयास करते हैं-
एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा, “जाओ और इस संसार में कोई एक अच्छा व्यक्ति खोजकर लाओ।” दुर्योधन पूरे दिन अनेकों स्थान पर गया और ढेरों लोगों से मिला, लेकिन अंत में शाम को खाली हाथ लौट आया और गुरु द्रोण से बोला, “गुरुदेव, मुझे इस संसार एक भी पूरी तरह अच्छा व्यक्ति नहीं मिला। हर व्यक्ति में कोई न कोई कमी है, कोई न कोई स्वार्थ है।” अगले दिन गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से कहा, “जाओ और कोई एक बुरा व्यक्ति खोजकर लाओ।” युधिष्ठिर भी पूरे दिन लोगों से मिले और शाम को वे भी खाली हाथ लौटे और विनम्रता के साथ बोले, “गुरुदेव, मुझे कोई भी पूर्ण रूप से बुरा व्यक्ति नहीं मिला। हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई अवश्य दिखाई दी।”
दोस्तों, संसार वही था, लोग वही थे, लेकिन परिणाम अलग था क्योंकि देखने वाली आँखें अलग थी। दुर्योधन को हर व्यक्ति में दोष दिखाई दिए क्योंकि उसके भीतर संदेह, अहंकार और नकारात्मकता भरी हुई थी। युधिष्ठिर को हर व्यक्ति में अच्छाई दिखाई दी क्योंकि उनके भीतर करुणा, विश्वास और सकारात्मकता थी। यही जीवन का सबसे बड़ा पाठ है। यदि हमारे भीतर कटुता है तो हमें हर जगह कटुता दिखाई देगी। यदि हमारे भीतर ईर्ष्या है तो हमें हर व्यक्ति प्रतिस्पर्धी लगेगा। यदि हमारे भीतर असुरक्षा है तो हमें हर सफलता खतरे की तरह दिखाई देगी। लेकिन यदि हमारे भीतर प्रेम है, तो हमें हर व्यक्ति में कुछ अच्छा दिखाई देगा। यदि हमारे भीतर विश्वास है, तो हमें हर परिस्थिति में अवसर दिखाई देगा। यदि हमारे भीतर शांति है, तो हमें संसार भी अधिक शांत दिखाई देगा।
दोस्तों, आज हम दुनिया को बदलने की बातें बहुत करते हैं। हम चाहते हैं कि लोग बदल जाएँ, परिस्थितियाँ बदल जाएँ, समाज बदल जाए। लेकिन वास्तविक परिवर्तन हमेशा भीतर से शुरू होता है। महात्मा गांधी ने कहा था, “स्वयं वह परिवर्तन बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” दोस्तों, यदि हम चाहते हैं कि लोग ईमानदार हों, तो पहले हमें ईमानदार बनना होगा। यदि हम चाहते हैं कि लोग हमें सम्मान दें, तो पहले हमें सम्मान देना सीखना होगा। यदि हम चाहते हैं कि दुनिया में अच्छाई बढ़े, तो पहले हमें अपने भीतर अच्छाई विकसित करनी होगी क्योंकि अच्छाई खोजने से अधिक महत्वपूर्ण है अच्छा बनना।
अंत में बस इतना ध्यान रखिएगा, हक़ीक़त में दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है। कमी तो केवल इस बात की है कि हम दूसरों को बदलने में इतने लगे रहते हैं कि स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास भूल जाते हैं। जिस दिन हम स्वयं को अच्छा बनाने की यात्रा शुरू कर देंगे, उसी दिन दुनिया भी हमें पहले से अधिक सुंदर, सकारात्मक और मानवीय दिखाई देने लगेगी क्योंकि दोस्तों सच यही है कि अच्छे व्यक्ति का मिलना कठिन नहीं है, स्वयं अच्छा बन पाना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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