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कहीं हम अपनी पहचान तो नहीं खोते जा रहे हैं…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Nov 7
  • 3 min read

Nov 7, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

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दोस्तों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक से लेस आज की दुनिया में हर क्षण आपको धारणाओं के आधार पर परिभाषित किया जा रहा है। याने हर क्षण कहीं आपके बारे में राय बनाई जा रही है या कहीं आपकी आलोचना की जा रही है या फिर आपकी तुलना किसी से की जा रही है। इस कारण ऐसा लगता है जैसे आज के युग में कहीं ना कहीं लोग तय कर रहे हैं कि आपको क्या पहनना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, किस रास्ते पर चलना चाहिए, और किस सपने का पीछा करना चाहिए।

और इसी शोर में… कहीं ना कहीं हम अपनी आवाज़, अपनी पहचान या यूँ कहूँ ख़ुद को खोते जा रहे है।


सोच कर देखियेगा दोस्तों, अगर हम हर काम सिर्फ़ इस आधार पर करें कि ‘लोग क्या कहेंगे…’, तो क्या हम स्वाभाविक जीवन जी पाएंगे? मेरी नजर में तो नहीं क्योंकि हर तारीफ़ पर हम हवा में उड़ेंगे, और हर आलोचना पर टूट जाएँगे। याने हमारा जीवन दो सिरों के बीच झूलता रहेगा। एक तरफ़ झूठ पर आधारित परिपूर्णता का एहसास रहेगा, तो दूसरी तरफ़ गहरी निराशा। दोस्तों, सच्चा जीवन ना तो परिपूर्णता में है और ना ही गहरी निराशा में, वो तो इन दोनों के बीच में है, जहाँ हम दूसरों की सुनते तो हैं, पर निर्णय लेते हैं अपनी सच्चाई से।


दोस्तों, बाहरी राय हमें कमजोर बनाती है। जब हमारा आत्म-सम्मान, ‘लोग क्या कहेंगे…’ पर निर्भर रहता है, तो पल में हम खुश हो जाते हैं और पल में ही बिखर भी जाते है। आज सोशल मीडिया पर आधारित आभासी युग ने इस स्थिति को और भी कठिन बना दिया है। आज लाइक्स, कमेंट्स, फॉलोअर्स, आदि आत्म-मूल्य के पैमाने बन चुके हैं। याद रखियेगा, जो आत्मविश्वास दूसरों की राय से बना है, वह दूसरों की राय से ही टूट भी जाएगा।


दोस्तों, अगर आप वाक़ई इस जीवन को जीना चाहते हैं, तो आपको अपनी सच्चाई से जीना सीखना होगा। यह तब ही संभव होगा, जब हम जीवन को अपने मूल्यों के आधार पर जीना सीख जाएँगे। याने जब हम दूसरों की राय से अधिक सत्य, करुणा, ईमानदारी, विकास आदि को प्राथमिकता देते हुए जीवन के निर्णय लेना शुरू कर देंगे और हमारे कर्म हमारे जीवन मूल्यों के अनुरूप बन जाएँगे, तब हम भीतर से स्थिर हो जाएँगे और शांत रहते हुए अपना जीवन जी पायेंगे।


एक बार गौतम बुद्ध से किसी ने पूछा, “महात्मन, आप आलोचना से परेशान क्यों नहीं होते?” बुद्ध मुस्कुराए और बोले, “अगर कोई आपको उपहार दे और आप स्वीकार न करें, तो वह किसका रहेगा? उसी का ना जो दे रहा है। ठीक ऐसा ही आलोचना के साथ भी है। अगर आप उसे स्वीकार नहीं करते, तो वह उसी के पास रहती है जिसने दी है।”


दोस्तों, यही वो सच्चा संतुलन है जिसके विषय में हम चर्चा कर रहे थे। यह संतुलन आपको दूसरों की धारणाओं पर नहीं बल्कि अपने जीवन मूल्यों पर आधारित जीवन जीने का मौक़ा देता है। इस तरह की जीवनशैली अपनाने के लिए आपको अपना चीयरलीडर ख़ुद बनना पड़ेगा। याद रखियेगा, जीवन में हमेशा कोई आपके लिए तालियाँ नहीं बजाएगा। कई बार आपका प्रयास भी नहीं देखा जायेगा, कभी आपकी सच्चाई पर भी सवाल उठेंगे। ऐसी हर स्थिति में आपको खुदका चीयरलीडर बनना होगा और अपने हर छोटे-से-छोटे प्रयास को सराहना होगा। खुद से प्रेम करना होगा, ख़ुद को कोसने के स्थान पर प्रोत्साहित करना होगा। याने आपको अपने भीतर की उस योग्यता को पहचानना होगा जो निरंतर बेहतर बन रही है क्योंकि जब आप खुद को प्रोत्साहित करना सीख जाते हैं, तो बाहरी तालियों की ज़रूरत कम पड़ती है और यही वो अभ्यास है जो आपको भीतर से मज़बूत बनाता है; ख़ुद पर विश्वास बढ़ाता है। जो व्यक्ति खुद पर विश्वास करता है, वही दूसरों को भी प्रेरित करता है। इसीलिए शायद कहते हैं, “जब आप अपने ही हौसलों की आवाज़ सुनना शुरू करते हैं, तो दुनिया की तालियाँ भी उसी लय में बजने लगती हैं।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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