केवल 1 घंटा…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
- 3 min read
Feb 13, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन में अक्सर हम उपलब्धियों, सफलता और व्यस्तता के विषय में ज्यादा चर्चा करते हैं और इन भौतिक विषयों पर चर्चा करते समय अक्सर जीवन की सार्थकता को ही भूल जाते हैं। सुनने मे शायद आपको मेरी बात थोड़ी कटु, चुभने वाली और कड़क लगे लेकिन फिर भी मैं इसे आपसे साझा कर रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से मैंने एहसास किया है कि आज हम पूरे चौबीस घंटे के दिन में एक घंटा भी ख़ुद के लिए नहीं निकाल पा रहे हैं। क्या यह स्थिति हमें व्यर्थ के जीवन की ओर नहीं ले जा रही है?
प्रश्न तीखा है इसलिए इस पर एकदम प्रतिक्रिया देने के पहले जरा गंभीरता से सोच कर देखिएगा। आज हमारे पास हर काम के लिए समय है, बस हम ख़ुद के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। हम पूरा दिन शरीर के लिए जीते हैं, काम, जिम्मेदारियाँ, लक्ष्य, दौड़, तुलना आदि। लेकिन जो भीतर है, जो हमें सच में मनुष्य बनाता है, उसके लिए समय निकालना हमें फिजूल या असंभव सा लगता है और हाँ, मैं यह बात अपने जीवन, अपने अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ।
दोस्तों, याद रखिएगा भौतिक वस्तुओं और उपलब्धियों से पहले आप स्वयं हैं और किसी भी अन्य चीज से पहले ख़ुद को पाना सबसे जरूरी है और ख़ुद को प्रेम, प्रार्थना और ध्यान से ही पाया जा सकता है। जी हाँ, प्रेम, प्रार्थना या ध्यान से हम सब उस अदृश्य सत्य की खोज कर सकते हैं, जो हर दृश्य या हर इंसान के भीतर छिपा बैठा है। जब तक मनुष्य इस खोज पर नहीं निकलता, तब तक वह कितना भी धन इकट्ठा कर ले, भीतर से दरिद्र ही रहता है। वह कितने ही महल बना ले, कितनी ही ऊँची दीवारें खड़ी कर ले, भीतर से असुरक्षित ही रहता है। वैसे भी अंत में जब मृत्यु आती है, तो वह यह नहीं देखती कि आपने क्या कमाया, वह यह देखती है कि आपने क्या जाना।
इस सत्य को अपने जीवन में गहराई से जिया था लियोनार्डो डा विंची। दुनिया के लिए वे एक महान चित्रकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक और इंजीनियर थे, लेकिन हकीकत में वे सबसे पहले अंतर्मुखी साधक थे। वे घंटों अकेले बैठकर अपने विचारों को देखते थे और ख़ुद से प्रश्न पूछते थे, “मैं कौन हूँ?” “मैं जो देख रहा हूँ, वह सच है या भ्रम?” उनकी महानता का रहस्य उनकी व्यस्तता नहीं, उनका अकेलेपन से मित्रता करना था।
दोस्तों, ज्ञान मनुष्य की गरिमा है और ज्ञान का जन्म तब होता है जब हम स्वयं को अपने शरीर, अपनी भूमिका, अपनी पहचान से थोड़ा अलग करके देखने लगते हैं। जैसे फूल अपनी जगह खड़ा रहता है, लेकिन उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है, वैसे ही मनुष्य को अपने शरीर से थोड़ा ऊपर उठना सीखना होता है। शरीर दिखता है, लेकिन जो जानता है, वह अदृश्य है। साधना यही है, फूल को नहीं तोड़ना, सिर्फ़ उसकी सुगंध को पहचान लेना।
हम पूरी ज़िंदगी शरीर के स्तर पर कमाते रहते हैं, याने नाम, पैसा, सुरक्षा, प्रतिष्ठा आदि के लिए काम करते हैं। लेकिन मौत एक क्षण में यह सब छीन लेती है। जो नहीं छीना जा सकता, वह है, आपका अनुभव, आपकी समझ, आपकी चेतना। वही आपके साथ जाती है।
इसलिए मैं आपसे एक बहुत साधारण आग्रह कर रहा हूँ, चौबीस घंटों में से केवल एक घंटा अपने लिए निकालिए। तेईस घंटे शरीर को दे दीजिए, काम कीजिए, जिम्मेदारियाँ निभाइए। लेकिन एक घंटा अपने भीतर की खोज के लिए बचा लीजिए। चुपचाप बैठिए; कुछ मत कीजिए; बस देखिए, आपके भीतर क्या चल रहा है। याद रखिएगा, जो आदमी एक घंटा भी अपने लिए नहीं निकालता, वह जी तो रहा है, लेकिन जीवन को जान नहीं रहा और अंत में, जब सारा हिसाब होता है, तो वही व्यक्ति अमीर मरता है जिसने भीतर कुछ बचाया हो। इसलिए आज खुद से पूछिए, अगर मृत्यु अभी आ जाए, तो क्या मेरे पास बचाने योग्य कुछ है? अगर नहीं, तो देर मत कीजिए और आज से ही एक घंटा अपने लिए जीना शुरू कीजिए।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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