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माँ–बाप से महान कोई नहीं !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 13 hours ago
  • 3 min read

Feb 14, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आज हम सफलता, पद, क्षमता और बुद्धि आदि विषय पर चर्चा करने के स्थान पर, उनके बारे में चर्चा करेंगे जिनकी वजह से आज हम इस खूबसूरत दुनिया में जी पा रहे हैं। जी हाँ, आप सही अंदाजा लगा रहे हैं, हम आज उस रिश्ते पर बात करेंगे, जिसकी गहराई को हम अक्सर पहचान ही नहीं पाते। चलिए सांकेतिक बात करने के स्थान पर सीधे शुरुआत करते हैं…


हम दुनिया में हर चीज़ को तर्क से समझना चाहते हैं, लेकिन कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें तर्क नहीं, संवेदना समझाती है। ऐसी ही एक चीज है हमारे माता-पिता का निस्वार्थ प्रेम, ममता और त्याग; जिसे अक्सर रोजमर्रा की आपाधापी में नजरंदाज कर दिया जाता है। आइए, उसी निस्वार्थ प्रेम और उसकी गहराई को हम एक कहानी से समझने का प्रयास करते हैं-


बात कई साल पुरानी है, एक बार राजा के दरबार में एक सौदागर दो स्वस्थ और सुंदर गाय लेकर आया था। दोनों देखने में इतनी समान थीं कि उन्हें पहचानना असंभव था। सौदागर ने राजसभा में राजा को प्रणाम करते हुए कहा, “महाराज, ये गायें माँ और बेटी हैं, पर मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ कि इनमें से कौन माँ है और कौन बेटी। बहुत लोगों से पूछा, पर कोई उत्तर नहीं दे सका। आपके मंत्रियों की बुद्धिमानी के विषय में काफ़ी सुन रखा था, इसलिए यहाँ चला आया। शायद वे मेरी दुविधा का समाधान दे सकें।


सौदागर की बात सुन मंत्री ने दोनों गायों को ध्यान से देखा और हर संभव निरीक्षण किया, पर वह भी असमंजस में पड़ गया। अंत में उसने राजा से एक दिन की मोहलत माँगी। घर लौटकर वह चिंतित था। उसकी पत्नी ने कारण पूछा। जब पूरी बात सुनी, तो वह मुस्कुराई और बोली, “बस इतनी सी बात? यह तो मैं भी बता सकती हूँ।” अगले दिन वह मंत्री के साथ वहाँ पहुँची। उसने दोनों गायों के सामने भरपूर भोजन रख दिया। कुछ देर बाद जो दृश्य सामने आया, वही जीवन की सबसे बड़ी सीख बन गया। एक गाय ने जल्दी-जल्दी अपना भोजन खाया और फिर दूसरी गाय के हिस्से की ओर बढ़ने लगी। दूसरी गाय चुपचाप खड़ी रही—उसने अपना भोजन छोड़ दिया। मंत्री की पत्नी ने शांत स्वर में कहा, “जो गाय अपने भोजन से पहले दूसरे की चिंता कर रही है, वही माँ है क्योंकि माँ–बाप ही ऐसे होते हैं जो स्वयं भूखे रहकर भी संतान को खिलाते हैं।” दरबार में सन्नाटा छा गया।


दोस्तों, यह कहानी केवल गायों की नहीं है, यह हमारे जीवन का आईना है। हम बड़े होकर अक्सर भूल जाते हैं कि हमारी थाली में जो पहला कौर आया, वह किसी और की भूख से होकर आया था। माँ ने अपनी नींद छोड़ी, पिता ने अपने सपने टाले, ताकि हमारे सपनों को पंख मिल सकें।


इस सत्य को अपने जीवन में गहराई से समझा था ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के पिता ने। वे बहुत साधारण नाविक थे। कलाम बताते हैं कि उनके पिता कई बार खुद उपवास रखते थे, लेकिन बच्चों की पढ़ाई और भोजन में कभी कमी नहीं आने देते थे। कलाम ने एक बार कहा था, “मेरी सफलता मेरी नहीं, मेरे माता–पिता के त्याग की परिणति है।”


दोस्तों, दुनिया में बहुत से रिश्ते शर्तों पर चलते हैं, पर माँ–बाप का रिश्ता निःशर्त होता है। वे बदले में कुछ नहीं माँगते। न प्रसिद्धि, न धन्यवाद, न सम्मान। बस एक चीज़ चाहते हैं कि उनकी संतान ठीक रहे। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम माँ–बाप को “समय नहीं दे पाते”, लेकिन मोबाइल के लिए समय निकाल लेते हैं। हम उनके शब्दों को “पुरानी सोच” कहकर टाल देते हैं, लेकिन बाहर की सलाह को गंभीरता से लेते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।


दोस्तों, माँ की ममता और पिता का प्रेम सागर नहीं—महासागर है। जिसकी गहराई तब समझ आती है जब हम स्वयं किसी के लिए भूखे रहना सीखते हैं। आज अगर आपके माता–पिता जीवित हैं, तो यह ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। उनके चरणों में झुक जाना कमजोरी नहीं, सबसे बड़ा सौभाग्य है क्योंकि इस संसार में माँ–बाप से महान कोई नहीं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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