क्या आप बंधनों के साथ जी रहे हैं?
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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Jan 22, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

क्या आप बंधनों के साथ जी रहे हैं?
दोस्तों, आज मैं आपसे एक बहुत ही सरल, लेकिन जीवन को हमेशा के लिए बदल देने वाले विचार पर बात करना चाहता हूँ। जिसे किताबों से नहीं अपितु अनुभव की पाठशाला से लिया है। मेरा मानना है, “जिसे अपने बंधनों का ज्ञान है, वह मुक्ति के द्वार पर खड़ा है।” लेकिन अकसर हमारी धारणा इस विचार के विपरीत होती है। सामान्यतः हममें से ज्यादातर लोग तो बंधनों के साथ ही मान कर चलते हैं कि हम आजाद हैं क्योंकि हमें लगता है, हम अपनी मर्ज़ी से जी रहे हैं; अपने फैसले खुद ले रहे हैं।
लेकिन अगर गहराई से देखेंगे, तो पाएँगे कि हम में से ज़्यादातर लोग बंधन में जी रहे हैं… और सबसे बड़ी बात, हमें इसका एहसास तक नहीं है। किसी को धन का बंधन है, किसी को रिश्तों का, किसी को समाज की अपेक्षाओं का, तो किसी को अपने ही डर, क्रोध, अहंकार और लोभ का। हम कहते हैं, “मैं ऐसा ही हूँ।”; “मेरी मजबूरी है।”; “मेरे हालात ऐसे हैं।”, और इन्हीं बातों को मानकर हम जीवन भर वही ढोते रहते हैं।
दोस्तों, समस्या बंधन होना नहीं है। समस्या यह है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम बंधे हुए हैं। जिस दिन इंसान यह स्वीकार कर लेता है कि “हाँ, मैं किसी न किसी बंधन में हूँ”, उसी दिन आत्मज्ञान की शुरुआत हो जाती है। क्योंकि जब तक हमें यह पता ही नहीं होगा कि हमारे हाथ बंधे हैं, हम आज़ादी की कोशिश कैसे करेंगे?
बंधन का ज्ञान मतलब यह समझना कि, मैं डर से निर्णय ले रहा हूँ या समझ से? मैं प्रेम से बोल रहा हूँ या अहंकार से? मैं सच में क्या चाहता हूँ, और क्या सिर्फ समाज मुझसे चाहता है? यह सवाल पूछना ही पहला साहस है।
मुक्ति कोई अचानक मिलने वाली चीज़ नहीं है। मुक्ति एक यात्रा है। और इस यात्रा का पहला कदम है, अपने बंधनों को पहचानना। जिसने अपने बंधनों को पहचान लिया, वह पहले से ही मुक्ति के दरवाज़े पर खड़ा है। अब बस एक काम बाकी है, हिम्मत करके वह दरवाज़ा खोलना।
लेकिन यहीं एक बड़ी सच्चाई सामने आती है दोस्तों, परिवर्तन से डरना और संघर्ष से बचना, मनुष्य की सबसे बड़ी कायरता है। हम कहते हैं, “अभी समय ठीक नहीं है।”; “बाद में देखेंगे।”; “ऐसे ही चल रहा है।”
लेकिन सच्चाई यह है कि जो व्यक्ति आज नहीं बदलता, वह कल भी नहीं बदलता। बंधन आरामदेह होते हैं, लेकिन वे हमें छोटा बनाए रखते हैं। संघर्ष असुविधाजनक होता है, लेकिन वही हमें बड़ा बनाता है।
इसलिए आज खुद से एक ईमानदार सवाल पूछिए;
1) क्या मैं किसी डर में जी रहा हूँ?
2) क्या मैं किसी अपेक्षा के बोझ तले दबा हूँ?
3) क्या मैं अपने भीतर की आवाज़ को दबाकर जी रहा हूँ?
अगर जवाब “हाँ” है, तो घबराइए मत। क्योंकि पहचान ही पहली आज़ादी है। आज आपने देख लिया, समझ लिया, स्वीकार कर लिया, बस यहीं से आपकी मुक्ति शुरू हो गई।
दोस्तों, जीवन का उद्देश्य बंधनों में घुट-घुटकर जीना नहीं है। जीवन का उद्देश्य जागना है, समझना है और धीरे-धीरे मुक्त होना है। याद रखिए, जो अपने बंधनों को देख सकता है, वह उनसे ऊपर उठने की शक्ति भी रखता है। इसी जागरूकता के साथ, इसी साहस के साथ एक कदम आगे बढ़ाइए।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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