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ख़ुद का साथ देना है ज़्यादा ज़रूरी…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
1 day ago
3 min read

Oct 28, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, गौर करके देखिएगा, आजकल फ्री या अकेले होते ही हमारा हाथ सबसे पहले मोबाइल की तरफ बढ़ता है और ज़रूरत हो या न हो, हम उसी क्षण किसी न किसी को फोन लगाने लगते हैं या सोशल मीडिया देखने लगते हैं या फिर आस-पास मौजूद किसी से भी बात करना शुरू कर देते हैं। मानो कुछ पल भी अपने साथ बिताना मुश्किल हो गया हो। ऐसे में मन में प्रश्न उठता है कि आखिर हम ख़ुद के साथ रहने से इतना क्यों घबराते हैं? शायद हम ख़ुद के मन में उठने वाली आवाज़ों को सुनने से बचना चाहते हैं।


दूसरे शब्दों में कहूँ तो जब हम दूसरों के साथ होते हैं, तो हम दुनिया की बातें सुनते हैं, लेकिन अकेले होते ही हमें अपने मन की आवाज़ सुनाई देने लगती है और कई बार हम उसी आवाज़ से बचना चाहते हैं। प्रसिद्ध लेखिका बेल हुक्स ने इस विषय में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए बताया है कि प्रेम करना सीखने के लिए अकेले रहना सीखना भी ज़रूरी है। बात सुनने में बहुत सरल और सहज लगती है, लेकिन हक़ीक़त में बहुत गहरी है। अगर हम दूसरों के साथ सिर्फ़ अपने अकेलेपन से बचने के लिए रहते हैं, तो हम उस रिश्ते में प्रेम से ज़्यादा अपनी ज़रूरत पूरी कर रहे होते हैं।


ज़रा सोच कर देखिएगा, आजकल अगर कोई फोन न करे तो लोग उदास हो जाते हैं, कोई तारीफ न करे तो उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है या कोई दूर जाने लगे तो उन्हें लगता है कि जैसे उनकी पूरी दुनिया उजड़ गई है। ऐसे लोगों को देख ऐसा लगता है मानो इन्होंने ख़ुद को ख़ुश रखने की ज़िम्मेदारी दूसरों को दे रखी है।


दोस्तों, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हमें रिश्तों की जरूरत नहीं है। रिश्ते जीवन को खूबसूरत बनाते हैं। जितना यह सही है दोस्तों की हँसी, परिवार का साथ और अपनों का प्यार हमारी खुशियों को बढ़ाता है, उतना ही सही यह भी है कि किसी के साथ रहना हमारी पसंद होनी चाहिए, मज़बूरी नहीं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो अकेले रहने का अर्थ, अकेला पड़ जाना नहीं है। इसका अर्थ तो सिर्फ़ इतना है की हमें खुद को समझने के लिए भी थोड़ा समय निकालना चाहिए। अपनी पसंद पहचानना, अपनी कमियों को स्वीकार करना और बिना किसी की स्वीकृति के भी खुद को महत्व देना, पूर्णता के साथ जीवन जीने के लिए आवश्यक है।


दोस्तों अगर मेरी उपरोक्त बात से सहमत हों तो इसकी शुरुआत आज ही से कीजिए और प्रतिदिन पंद्रह मिनट अपने लिए निकालना शुरू कीजिए और मोबाइल को दूर रख, टहलने जाइए, कुछ पढ़िए या शांत बैठकर अपने दिन के बारे में सोचिए। इतना ही नहीं समय-समय पर खुद से पूछिए, ‘आज मुझे किस बात से खुशी मिली?’, ‘कौन सी बात या चीज़ मुझे परेशान कर रही है?’, ‘मैं अपने जीवन में क्या बदलना चाहता हूँ?’ जैसे-जैसे आप ख़ुद के साथ समय बिताना शुरू करेंगे वैसे-वैसे आप अपने साथ खुश रहना सीख जाते हैं, और जब आप ख़ुद के साथ ख़ुश रहना सीख जाते हैं, तब आप रिश्तों में खालीपन भरने के लिए किसी के साथ समय बिताने नहीं जाते, बल्कि आप खुशियाँ बाँटने के लिए जाते हैं। आप किसी के साथ समय उसे खोने के डर से नहीं बिताते, बल्कि आप उसके साथ प्रेम और सम्मान के कारण रहते हैं।


दोस्तों, दूसरों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाइए, अपनी पूरी ज़िंदगी नहीं। खुद से भी उतना ही प्यार कीजिए, जितना आप दूसरों से करते हैं क्योंकि दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना जितना जरूरी है, कभी-कभी अपने साथ बैठना भी उतना ही जरूरी है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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