जिएँ उत्साह के साथ…

Oct 24, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, ज़िंदगी एक नाटक की तरह है, जिसमें हर पल एक नया दृश्य हमारे सामने आता है। इनमें से कुछ दृश्य हमें हंसाते हैं, कुछ रुलाते हैं और कुछ ऐसे सबक दे जाते हैं, जिन्हें हम उम्र भर भुला नहीं पाते हैं। इन्हीं मिली जुली प्रतिक्रियाओं के कारण कई बार तो हम इस नाटक में इतना खो जाते हैं कि ख़ुद को ही इसका एक पात्र मानने लगते हैं और कई बार दृश्य बदल जाने के बाद भी पुराने दृश्यों में उलझे रह जाते हैं। जैसे कभी किसी ने आपसे या आपने किसी से कुछ ग़लत कह दिया या कोई फैसला गलत हो गया अथवा किसी अवसर को पहचानने में चूक कर दी और हम इन घटनाओं को बार-बार याद करके ख़ुद को दोषी ठहराना शुरू कर देते हैं। जबकि हम जानते हैं कि ऐसा करने से बीता हुआ कल नहीं बदलता। लेकिन हाँ, हमारा आज जरूर खराब हो जाता है।
दोस्तों, समझदारी का अर्थ कभी गलती ना होने देना नहीं है। समझदारी का अर्थ तो गलती होने के बाद उसे दिल से स्वीकार करने, सीखने और और आगे बढ़ जाने में है। गलती को अपना शिक्षक बनाइए, पहचान नहीं। जब हमारी समझ बढ़ती है, तो हम घटनाओं को अपराधबोध की नजर से नहीं, सीखने के अवसर की तरह देखना शुरू कर देते हैं। एक अभिनेता को ही देख लीजिए। मंच पर उसका एक दृश्य समाप्त होता है, तो वह अगले दृश्य के लिए तैयार हो जाता है। वह पहले दृश्य में हुई गलती को लेकर अगले दृश्य का अभिनय खराब नहीं करता। जीवन में भी यही दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। जो बीत गया, वह अनुभव बन सकता है, लेकिन उसे भविष्य की बेड़ियाँ बनने से रोकना हमारे हाथ में है।
अगर आप इस सूत्र को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं तो इसके लिए एक छोटा-सा अभ्यास कीजिए। जब भी कोई पुरानी घटना आपको परेशान करे, तो खुद से ये तीन सवाल पूछिए। पहला, इससे मैंने क्या सीखा? दूसरा, क्या अब भी इसे सुधारने का कोई रास्ता है? अगर नहीं, तो इसे याद करके मैं अपना आज क्यों बिगाड़ रहा हूँ?
मशहूर विचारक रॉबर्ट एलियट ने इसी सूत्र को समझाते हुए दो बात बताई हैं। पहली, छोटी-छोटी बातों पर परेशान मत होइए; दूसरी, याद रखिए कि अधिकांश बातें छोटी ही होती हैं। सुनने में साधारण लगने वाली यह बात असल में बहुत गहरी है। सामान्यतः हम छोटी सी घटना को अपने मन में इतना बडा बना लेते हैं कि हमें जीवन की बड़ी खुशियाँ दिखाई देना बंद हो जाती है।
दोस्तों, खुश और सुखी रहना चाहते हैं तो याद रखिए, हर बात पर प्रतिक्रिया देना, हर गलती पर खुद को सजा देना और हर बीती घटना को बोझ की तरह ढोना क़तई जरूरी नहीं है। अगर ज़िन्दगी को वाक़ई बेहतर बनाना है तो आवश्यकता अतीत को बदलने या दोष देने की नहीं, बल्कि उसे देखने का नजरिया बदलने की है। इसलिए बीते कल से सीखिए, आज को मुस्कुराकर स्वीकारिये और खुल कर जीवन को जीते हुए, आने वाले कल को बेहतर बनाने में जुट जाइए और हमेशा याद रखिए, ज़िंदगी का असली आनंद हर दृश्य को परफेक्ट बनाने में नहीं, बल्कि हर दृश्य के बाद फिर से पूरे उत्साह के साथ जीने में है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




Comments