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दृढ़ संकल्प और धैर्य से पाएँ मंज़िल…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
16 hours ago
3 min read

Oct 19, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, लक्ष्य कितना भी बड़ा क्यों ना हो, उसकी शुरुआत अक़्सर एक छोटे-से निर्णय से होती है। यानी जिस दिन आप यह तय करते हैं, “मुझे यह हर हाल में करना या पाना है”, उसी दिन आप अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना शुरू कर देते हैं। हाँ! यह भी सही है कि सिर्फ़ इच्छा आपको मंजिल तक नहीं ले जाती। उसके लिए आपको तमाम अनिश्चितताओं के बीच कार्य करना पड़ता है और जब आप कर्म करते हैं, तब रास्ते में उलझन भी होगी, संशय भी होगा, परिस्थितियाँ भी विरोध करेंगी और आपका सामना असफलता से भी होगा। जिसके कारण आपका मन आपको बार-बार यह समझायेगा कि शायद अभी सही समय नहीं आया है। यही वह पल या स्थिति होती है, जहाँ से जीवन में दृढ़ संकल्प के महत्व या भूमिका की शुरुआत होती है।


दोस्तों, दृढ़ संकल्प का अर्थ केवल यह तय करना नहीं है कि हम जीवन में क्या हासिल करना चाहते हैं। यह तो वह मानसिक शक्ति होती है, जो हमें रोकने वाले विचारों के पार ले जाती है। उदाहरण के लिए जब मन कहेगा, “तुमसे नहीं होगा।” तब संकल्प आपको प्रेरित करते हुए कहेगा, “एक बार कोशिश करके तो देखो।” जब मन रास्ते को ‘कठिन’ बताएगा, तब संकल्प आपकी ऊर्जा को बढ़ाते हुए कहेगा,“कठिन है, इसलिए इसे करने की ज़रूरत है।”


लेकिन दोस्तों, लक्ष्य पाने के लिए दृढ़ संकल्पित रहते हुए कर्म करना भी पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आपको ‘धैर्य’ के महत्व को भी समझना होगा। सामान्यतः लक्ष्य पाने की राह की सबसे बड़ी परेशानी, प्रयास के तुरंत बाद परिणाम की चाह रखना है। यानी हम बीज बोते ही पेड़ देखना चाहते हैं, उससे फल तोड़ना चाहते हैं। यानी हम पहली कोशिश के बाद सफलता चाहते हैं। कुछ दिनों की मेहनत के बाद बदलाव चाहते हैं और यह भूल जाते हैं कि प्रकृति चाहत या ज़ल्दबाज़ी की नहीं, बल्कि प्रक्रिया का पाठ पढ़ाती है। जिस तरह बीज को मिट्टी के भीतर, कीचड़ के बीच कुछ दिन अकेले और अदृश्य रहते हुए अपनी जड़ जमानी पड़ती है, ठीक वैसे ही इंसान को लक्ष्य पाने के लिए गुमनामी, असफलता, अनिश्चितता और विषम परिस्थितियों के बीच धैर्य के साथ अकेले रहते हुए प्रयास करना होता है। जिस तरह मिट्टी के भीतर दबे बीज को अगर बाहर से देखा जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कुछ हो ही नहीं रहा है। जबकि भीतर धीरे-धीरे जड़ें बन रही होती है। ठीक इसी तरह जीवन में भी कई बार परिणाम दिखाई नहीं देता, क्योंकि परिवर्तन अभी भीतर हो रहा होता है।


दोस्तों, धैर्य की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर चीज़ को धक्का देकर अपनी गति से चलाने की कोशिश मत कीजिए। कुछ चीज़ों को समय चाहिए। कुछ परिस्थितियाँ अपने आप बदलेंगी। कुछ परिणाम हमारी तैयारी पूरी होने के बाद ही आएँगे। बस याद रखिएगा, धैर्य का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना नहीं है। धैर्य का अर्थ है, बिना परिणाम पाने और दिशा खोने की बेचैनी के अपना काम करते रहना। कोच और कंसलटेंट के रूप में कार्य करते हुए मैंने देखा है कि लोग प्रतिभा की कमी की वजह से नहीं, बल्कि निरंतरता की कमी की वजह से पीछे रह जाते हैं। वे शुरुआत बहुत उत्साह से करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद जब परिणाम अपेक्षा के अनुसार नहीं मिलता, तो रास्ता बदल देते हैं और फिर कभी परिस्थितियों को, तो कभी समय को या फिर कभी संसाधनों को और कभी किस्मत को दोष देते हैं।


दोस्तों, जिस दिन बहाने समाप्त होते हैं, उसी दिन वास्तविक परिणामों की शुरुआत होती है। इसलिए दोष देने के स्थान पर ख़ुद से पूछिए, “इन परिस्थितियों में मैं क्या कर सकता हूँ?” तभी आपकी सोच बदलेगी और नए रास्ते खुलेंगे। इसलिए ख़ुद को रोज़ याद दिलाइए, दृढ़ संकल्प हमें आगे बढ़ने की शक्ति देता है और धैर्य हमें रास्ते में टिके रहने की क्षमता। एक के बिना दूसरा अधूरा है। संकल्प बिना धैर्य के अधीरता बन सकता है और धैर्य बिना संकल्प के निष्क्रिय प्रतीक्षा। इसलिए लक्ष्य बड़ा रखिए, प्रयास ईमानदार से करिए और समय को अपना काम करने दीजिए। याद रखिएगा, हर सुबह सफलता का प्रमाण नहीं देती, लेकिन हर ईमानदार प्रयास आपको सफलता के थोड़ा और करीब ले जाता है। इसलिए बहानों को छोड़िए, अपने निर्णय पर टिकिए और धैर्य रखिए, जल्द ही सफलता आपके कदम चूमेगी।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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