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चलें कुछ कदम अपने लिए...

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 1 day ago
  • 3 min read

Aug 18, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, यकीन मानिएगा जीवन की हर यात्रा मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होती, कुछ यात्राएँ मन का बोझ उतारने के लिए भी होती हैं। यह एक ऐसा सच है जो मुझे जीवन ने बीतते समय के साथ सिखाया है। सहमत न हों तो जल्दी सुबह अकेले टहलने या रात को अकेले घूमने वाले उन पलों को याद करके देख लीजिए जब आपके हाथ में फ़ोन नहीं होता और न ही आपके साथ कोई बात करने वाला साथी होता है। उस वक्त आपको ना तो किसी बात की जल्दबाज़ी होती है और ना ही किसी बात की चिंता। उस वक्त तो बस आप और आपके कदम साथ होते हैं। उन क्षणों में धीरे-धीरे हमें एहसास होता है कि हम बाहर कम भीतर अधिक रास्ता तय कर रहे हैं। जी हाँ, पहले कुछ कदमों से शरीर चलता है और फिर हमारे साथ विचार चलने लगते हैं और कुछ देर बाद अपने आप ही हमारा मन हल्का होने लगता है।


दोस्तों, जीवन में हर समस्या का समाधान शब्दों में नहीं मिलता। जीवन के कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं, जिनका उत्तर कोई किताब भी नहीं देती; कोई मित्र भी नहीं देता और कोई गुरु भी तुरंत नहीं दे पाता। उनका उत्तर केवल समय, मौन और आत्मसंवाद यानी सेल्फटॉक देती है। आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति तुरंत उत्तर चाहता है। लेकिन प्रकृति की अपनी गति होती है। जिस तरह बीज को पेड़ बनने में समय लगता है। सूर्योदय अपने तय समय पर ही होता है। घावों को भरने का भी अपना एक निश्चित समय होता है। ठीक वैसे ही, मन के कुछ उत्तर भी केवल मौन में ही जन्म लेते हैं। मौन हम पर उन उत्तरों को थोपता नहीं है। वह केवल इतना करता है कि हमारे भीतर पहले से मौजूद सत्य को सुनने की जगह बना देता है।


दोस्तों, इसी तरह कई बार हम किसी व्यक्ति को माफ़ करने नहीं निकलते बल्कि हम अपने भीतर के क्रोध को छोड़ने के लिए निकलते हैं। कई बार हम अतीत को भूलने नहीं निकलते वरन् हम उसके बोझ से मुक्त होने निकलते हैं। कई बार हम किसी अन्य को खोजने न निकलकर स्वयं से मिलने निकलते हैं और यही हमारे जीवन की सबसे सुंदर यात्राएँ होती हैं। ये सभी यात्राएँ बाहर कम और भीतर अधिक घटती हैं। आज विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति के बीच कुछ समय बिताना, शांत वातावरण में चलना और बिना किसी डिजिटल व्यवधान के स्वयं के साथ रहना हमारे मस्तिष्क को संतुलित करता है। वैसे हमारे ऋषियों ने यह बात हजारों वर्ष पहले समझ ली थी। इसलिए उन्होंने वनवास को दंड नहीं, साधना बनाया। पदयात्रा को केवल यात्रा नहीं, आत्मयात्रा माना। असल में वे पहले से ही जानते थे कि चलते वक्त मन धीरे-धीरे अपनी उलझनों की गाँठें स्वयं खोलने लगता है।


दोस्तों, चलते कदमों से बने निशानों को समय मिटा देता है, लेकिन उन कदमों के दौरान जो शांति हमारे भीतर जन्म लेती है, उसे कोई, कभी भी नहीं मिटा सकता। यही जीवन की सबसे बड़ी कमाई है। इसलिए जब कभी मन बहुत उलझ जाए, कोई निर्णय समझ में न आए या फिर भीतर शोर बहुत बढ़ जाए, तो तुरंत उत्तर खोजने बैठने के स्थान पर थोड़ी देर टहलिए और प्रकृति के बीच जाकर मौन को अपना साथी बनाइए। संभव है, लौटते समय तक आपकी समस्या वही हो, लेकिन उसे देखने वाला आपका मन बदल चुका होगा।


लेकिन हाँ इस दौरान एक और बात याद रखिएगा, हर यात्रा किसी जगह तक पहुँचने के लिए नहीं होती। बल्कि कुछ यात्राएँ सिर्फ़ उस व्यक्ति तक पहुँचने के लिए होती हैं, जिसे हम भागदौड़ में सबसे पहले खो देते हैं— यानी स्वयं को पाने के लिए होती हैं। इसीलिए मैं अक्सर कहता हूँ, जब मन स्वयं से मिल लेता है, तब सचमुच महसूस होता है कि ज़िंदगी फिर भी हसीन है…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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