top of page
Search

चोरी, जो दिखाई नहीं देती !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 3 hours ago
  • 3 min read

Aug 27, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आचार्य चाणक्य का एक बड़ा अद्भुत कथन है, “जिस प्रकार पानी में तैरती हुई मछली कब पानी पी जाती है, यह जानना कठिन है; उसी प्रकार धन का लेन-देन करने वाला व्यक्ति कब धन में हेरफेर कर दे, यह जानना भी कठिन है।” पहली नज़र में यह बात केवल धन और भ्रष्टाचार की लगती है। लेकिन यदि गहराई से देखें तो आचार्य चाणक्य इससे हमें जीवन का एक बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र सिखाते हैं।


दोस्तों, हर चोरी पैसे की या किसी क़ीमती सामान की नहीं होती। कुछ चोरियाँ ऐसी होती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं, लेकिन समाज को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती हैं। जैसे कई लोग कार्यालय में कामचोरी कर, समय की चोरी करते हैं; कुछ लोग अपने कर्तव्य की चोरी करते है, तो कुछ लोगों का विश्वास चुरा लेते हैं। इसी तरह कई लोग अपने पद का दुरुपयोग करके, सही लोगों के अवसर चुराते हैं और इसमें सबसे दुखद बात तो यह है कि इन चोरियों का पता अक्सर तब चलता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है।


जी हाँ, ईमानदारी केवल पैसे लौटाने का नाम नहीं है। ईमानदारी का अर्थ है, “जिस जिम्मेदारी के लिए हमें चुना गया है, उसके प्रति पूरी निष्ठा रखना।” एक शिक्षक यदि बिना तैयारी के कक्षा में जाता है, तो वह केवल समय नहीं, विद्यार्थियों का भविष्य भी चुरा रहा होता है। इसी तरह एक डॉक्टर यदि संवेदनहीन होकर इलाज करता है, तो वह केवल पेशेवर गलती नहीं, विश्वास की चोरी करता है। एक सरकारी अधिकारी यदि फाइल को जानबूझकर रोकता है, तो वह केवल प्रक्रिया में बाधा नहीं बनता, बल्कि  वो किसी नागरिक की आशा रोकता है और एक माता-पिता यदि बच्चों को समय नहीं देते, तो वे अनजाने में उनके बचपन के सबसे सुंदर क्षणों की चोरी कर रहे होते हैं। इसलिए ही मैं कहता हूँ कि चोरी का अर्थ केवल किसी की वस्तु को ले लेना नहीं है। चोरी का असली अर्थ तो किसी और का अधिकार उससे छीन लेना है।


याद रखिएगा दोस्तों, चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा तब नहीं होती, जब लोग हमें देख रहे होते हैं। चरित्र की असली परीक्षा तो तब होती है, जब हमें कोई देख नहीं रहा हो तब भी हम दूसरों के अधिकारों की रक्षा करते हुए जीवन में आगे बढ़ते हैं। याने जब हम हर क्षण अपने अंतःकरण को साक्षी मान अपने विवेक से कार्य करते हैं। यही स्थिति तय करती है कि हम केवल कानून से डरते हैं या अपने विवेक से भी। इसी बात की गंभीरता को समझाने के लिए कहा गया है, “दुनिया की अदालत से बचना संभव हो सकता है, लेकिन अपनी आत्मा की अदालत से नहीं।” वैसे आप सही हैं या नहीं यह इससे भी पता चलता है कि रात को सोने से पहले आपका मन शांत रहता है या नहीं।


दोस्तों, आज समाज को केवल बुद्धिमान लोगों की नहीं, विश्वसनीय लोगों की आवश्यकता है क्योंकि ज्ञान से संस्था चल सकती है, लेकिन विश्वास से समाज चलता है। याद रखिएगा, प्रतिभा आपको सफलता दिला सकती है, लेकिन ईमानदारी ही आपको स्थायी सम्मान दिलाती है। अगर आप मेरी बात से सहमत हों तो आज ख़ुद से एक छोटा-सा प्रश्न पूछिएगा, “क्या मैं केवल धन की चोरी से बचता हूँ, या समय, विश्वास, जिम्मेदारी और अवसर की चोरी से भी?” यदि इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" है, तो विश्वास रखिए कि आप केवल एक सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चरित्रवान नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।


अंत में बस इतना और याद दिलाऊँगा, धन की चोरी से सिर्फ़ तिजोरी खाली होती है। लेकिन चरित्र की चोरी से पूरा समाज गरीब हो जाता है। इसलिए दोस्तों, अपने जीवन में ऐसी ईमानदारी विकसित कीजिए कि आपकी अनुपस्थिति में भी लोग निश्चिंत होकर कह सकें, “यह व्यक्ति जहाँ होगा, वहाँ विश्वास कभी कम नहीं होगा।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

Comments


bottom of page