जब अहंकार सफलता से बड़ा हो जाए…
- Nirmal Bhatnagar

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Aug 26, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, विनम्रता इंसान को भीतर से मज़बूत और अहंकार भीतर से खोखला बनता है। शायद इसीलिए यह दुनिया सफलता नहीं, इंसान की विनम्रता को आधार बनाकर, उसके बारे में धारणा बनाती है। इसी वजह से इतिहास में जितने भी महान व्यक्तित्व हुए हैं, उन्हें उनकी शक्ति के लिए नहीं, बल्कि उनकी विनम्रता के लिए परखा गया है। आइए, एक प्रेरक प्रसंग से इसे समझते हैं।
महाभारत काल में पांडवों का नियम था कि जब भी उनमें से कोई एक भाई द्रौपदी के साथ एकांत में होगा, उस वक्त दूसरा भाई उस कक्ष में प्रवेश नहीं करेगा। इस नियम को अगर कोई तोड़ेगा तो उसे बारह वर्ष का वनवास स्वीकारना होगा। एक बार एक ब्राह्मण ने दुष्टों से अपनी गौओं को छुड़वाने के लिए अर्जुन से सहायता माँगी। उस समय अर्जुन का गांडीव उस कक्ष में रखा था जहाँ युधिष्ठिर और द्रौपदी एकांत में थे। अर्जुन जानते थे कि अगर वो ब्राह्मण की सहायता करेंगे तो नियम टूटेगा, फिर भी उन्होंने अपने सुख से पहले एक पीड़ित ब्राह्मण की रक्षा को चुना। उन्होंने गांडीव उठाया, ब्राह्मण की सहायता की और बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वयं बारह वर्षों की तीर्थयात्रा पर निकल पड़े और यात्रा करते-करते रामेश्वरम् पहुँचे। वहाँ वे समुद्र के किनारे खड़े होकर, उस स्थान को निहारने लगे, जहाँ भगवान श्रीराम ने वानर सेना की सहायता से रामसेतु का निर्माण कराया था। तभी उनके मन में एक विचार आया और वो बुदबुदाने लगे, “यदि मैं उस समय होता, तो पत्थरों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। मैं अपने बाणों से ऐसा पुल बना देता जो पूरी सेना का भार सह लेता।”
दोस्तों, यही वह क्षण था जब सामर्थ्य के साथ अहंकार जुड़ गया। अर्जुन के बोले गए शब्दों को वहाँ बैठे एक वृद्ध वानर ने सुन लिया। वे मुस्कुराते हुए बोले, “पुत्र, तुम्हारे बाणों का पुल एक साधारण वानर का भार भी नहीं सह पाएगा।” वानर के कहे शब्दों को अर्जुन ने चुनौती के रूप में ले लिया और तुरंत अपने बाणों से एक अद्भुत पुल बना दिया और वृद्ध वानर को चुनौती देते हुए कहा, “यदि यह पुल टूट गया तो मैं अग्नि में प्रवेश कर लूँगा।” अर्जुन के शब्दों को सुन वानर ने मुस्कुराते हुए जैसे ही उस पुल पर कदम रखा, पूरा पुल समुद्र में बिखर गया। उस क्षण अर्जुन को पहली बार अनुभव हुआ कि प्रतिभा से बड़ा भी कोई सत्य है।
अर्जुन उसी क्षण वानर को प्रणाम कर अग्नि में प्रवेश करने की तैयारी करने लगे। तभी वहाँ एक तेजस्वी ब्राह्मण आए और
अर्जुन को दूसरी बार परीक्षा देने के लिए बोले क्योंकि वहाँ उनके प्रण का कोई साक्षी नहीं था। अर्जुन ने इस बार पहले से भी अधिक एकाग्रता से पुल बनाया और इस बार वही वानर पूरी शक्ति लगाने के बाद भी पुल को हिला नहीं सके। इस क्षण ने दोनों का भ्रम तोड़ दिया।
दोस्तों, वृद्ध वानर पवनपुत्र हनुमान और ब्राह्मण स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने अदृश्य रूप से पुल को सम्भाल रखा था। अर्जुन उसी क्षण समझ गए कि जिस सफलता पर वे गर्व कर रहे थे, उसके पीछे भी ईश्वर की अदृश्य कृपा थी। अर्जुन ने उस दिन सीखा कि “वीरता तभी पूर्ण होती है, जब उसके साथ विनम्रता हो। शक्ति का अहंकार मनुष्य को भगवान से दूर कर देता है, जबकि विनम्रता उसे भगवान की कृपा का पात्र बना देती है।” अर्जुन का अहंकार उसी क्षण समाप्त हो गया, जिसकी वजह से हनुमानजी ने महाभारत युद्ध में रथ की ध्वजा पर विराजमान रहकर अर्जुन का साथ दिया।
दोस्तों, यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। कई बार हमें लगता है कि हमारी सफलता केवल हमारी बुद्धि, परिश्रम या प्रतिभा का परिणाम है। जबकि हकीकत में इसमें माता-पिता का त्याग, गुरु का मार्गदर्शन, मित्रों का सहयोग, समाज का विश्वास और सबसे बढ़कर ईश्वर की कृपा जैसे असंख्य हाथों का योगदान रहता है। याद रखें, स्वयं को सब कुछ मानना ही पतन का कारण बनता है। इसीलिए कहते हैं, “प्रतिभा आपको सफलता दिला सकती है, लेकिन विनम्रता ही उस सफलता को स्थायी बनाती है।” इसलिए दोस्तों, सफलता को ईश्वर की कृपा और दूसरों के योगदान का परिणाम मानो और याद रखो जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं से वास्तविक महानता प्रारंभ होती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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