top of page
Search

जहाँ सेवा है, वहीं देवत्व है !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 18 hours ago
  • 3 min read

Jan 25, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, सेवा और त्याग दो ऐसे जीवन मूल्य हैं जो सामान्य इंसान के जीवन को सार्थक बनाकर उसे विशेष बनाते हैं; उसे भीड़ से अलग पहचान देते हैं। इसी बात को समझाते हुए सनातन संस्कृति में बताया गया है कि “जो समाज को देता है, वही देवतुल्य है।” उदाहरण के लिए आप वृक्ष को ही ले लीजिए, वृक्ष हमें फल और छाया देता है, इसलिए पूजा जाता है। इसी तरह नदी हमें जल देती है, इसलिए माँ के रूप में पूजी जाती है। वायु याने पवन भी हमें बिना कुछ माँगे प्राण देती है, इसलिए जीवन दायिनी मानी जाती है। यही दृष्टि दोस्तों, मनुष्य पर भी लागू होती है। जो मनुष्य समाज को कुछ देता है, वही वास्तव में मूल्यवान है।


इतिहास ऐसे अनेक महान लोगों के उदाहरण से भरा हुआ है, जिनके पास ना तो धन था, ना ही सत्ता और ना ही कोई पद। यहाँ तक की इनमें से कई तो बड़े साधारण परिवार से आए हुए थे, लेकिन इन सभी के भीतर सेवा का ऐसा भाव था कि वे अमर हो गए। ऐसी ही एक महान विभूति थीं मदर टेरेसा। उनके पास न बड़ा घर था, न बैंक बैलेंस, न कोई पद। लेकिन उनके पास करुणा से भरा हुआ हृदय था। वे सड़कों पर पड़े बीमार, असहाय, मरते हुए लोगों के पास जाती थीं, उनकी सेवा करती थी। जिन लोगों की वे सेवा करती थी उनमें से तो कई मरणासन्न अवस्था में होते थे। जब कोई उनसे पूछता कि, “इस सब से आपको क्या मिलता है?” तो वे मुस्कुराकर कहती थी, “मानव सेवा करने का आत्म संतोष मिलता है।” उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि “मैं सेवा करके कोई एहसान कर रही हूँ।” और ना ही उन्होंने इस सेवा कार्य के लिए स्वयं को महान माना और शायद यही कारण है कि दुनिया ने उन्हें महान माना।


दोस्तों, सेवा और त्याग दैवीय गुण हैं, लेकिन सेवा का अभिमान रखना जीवन का सबसे बड़ा रोग है। हम अक्सर देखते हैं, कोई थोड़ा सा दान कर देता है, और अपेक्षा करता है कि उसका नाम हो। कोई सेवा करता है, और चाहता है कि उसकी तस्वीर छपे। यहीं से सेवा, अहंकार में बदल जाती है। हमारे शास्त्र स्पष्ट कहते हैं, करने या देने का अभिमान चाहे मनुष्य में हो या देवराज इंद्र में, ईश्वर एक दिन उसे चूर-चूर कर देते हैं क्योंकि सेवा “मैं” से नहीं, “मुझे माध्यम बनाया गया” के भाव से होती है।


याद रखिएगा, प्रभु जब कृपा करते हैं, तो किसी के मन में सेवा का भाव जगा देते हैं और उसे समाज के लिए एक निमित्त बना देते हैं। याने सेवक खुद नहीं चुनता कि “मैं महान बनूँगा।” बल्कि सेवा खुद चुनती है कि “तू माध्यम बनेगा।”


आज के समय में हम सब बहुत कुछ लेना जानते हैं, समाज से, परिवार से, प्रकृति से। लेकिन सच्चा संतुलन तब बनता है जब हम देना भी सीखते हैं। हर किसी को अस्पताल नहीं खोलना, हर किसी को आश्रम नहीं बनाना। सेवा छोटे-छोटे रूपों में भी होती है, किसी थके हुए को सहारा देना, किसी दुखी को सुन लेना, किसी ज़रूरतमंद की मदद बिना नाम के कर देना।


दोस्तों, इसीलिए कहा जाता है कि जीवन का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि आपने कितना कमाया, बल्कि इससे तय होता है कि आपके कारण कितने लोगों का जीवन थोड़ा आसान हुआ और अंत में बस यही स्मरण रखें, समाज से लेना ही जीवन नहीं है, लेकिन समाज को देना ही जीवन की पूर्णता जरूर है। अब आप समझ ही गए होंगे साथियों कि हमारे दर्शन में क्यों कहा जाता है कि ‘जहाँ सेवा है, वहीं देवत्व है।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

Comments


bottom of page