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जागृति के साथ जियें सच्चा जीवन !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 12 hours ago
  • 3 min read

Feb 22, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, ‘मृत्यु’, एक ऐसी सच्चाई है जिसके विषय में हम सब जानते तो हैं, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग उसे याद रख कर जीते नहीं हैं। वैसे मृत्यु के विषय में एक सच्चाई और है, जब भी इसका विचार हमारे मन में गहराता है, उसी क्षण हमारे भीतर कहीं ना कहीं परमात्मा की याद भी जाग उठती है। मेरी नजर में इसका सीधा सा अर्थ सिर्फ़ इतना है कि ये दोनों अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पहलू हैं।


दोस्तों, हम जीवन भर किसी ना किसी कारण से व्यस्त रहते हैं। कभी कमाने में, तो कभी बनाने में या फिर दिखाने में, और इन सब में इस सत्य को भूल जाते हैं कि अंततः यह सब कुछ यहीं रह जाना है। लेकिन जैसे ही हम किसी दुर्घटना की खबर सुनते हैं, किसी अपने को खोते हैं, या अचानक मृत्यु का विचार हमारे मन को छूता है, तो हमारा मन तुरंत ठहर जाता है। जानते हैं क्यों? क्योंकि मृत्यु हमें याद दिलाती है कि हम स्थायी नहीं हैं और जब अस्थायी होने का बोध आता है, तभी स्थायी सत्य की तलाश शुरू होती है, जिसे हम परमात्मा, सत्य या चेतना कहते हैं।


इसी सत्य को अपने जीवन में गहराई से समझा था स्टीफन हॉकिंग ने। जो एक तेज दिमाग के युवा वैज्ञानिक थे। वे जानते थे कि उनका भविष्य उज्ज्वल है। लेकिन 21 वर्ष की आयु में उन्हें एक असाध्य बीमारी का पता चला। डॉक्टरों ने उन्हें कह दिया था कि अब वे संभवतः दो साल से ज़्यादा जीवन नहीं जी पायेंगे। सोच कर देखिएगा उस क्षण उनपर क्या गुज़री होगी? लेकिन यही क्षण उनके जीवन का मोड़ बन गया। बाद में उन्होंने एक बार कहा था, “जब आपको एहसास हो जाता है कि जीवन सीमित है, तब आप हर क्षण को सार्थक बनाने लगते हैं।” गहराई से उनके इस कथन को समझा जाये तो मृत्यु की निकटता ने उन्हें डराया नहीं, बल्कि जागृत कर दिया था। इसी वजह से उन्होंने अपने शेष जीवन को शिकायत में नहीं, सृजन में लगाया और हम सब जानते ही हैं कि जिस व्यक्ति के जीवन को कुछ साल का बताया गया था, वह दशकों तक जीवित रहा और विज्ञान को नई दिशा दे गया।


दोस्तों, मृत्यु का स्मरण डरने के लिए नहीं, जागने के लिए होता है। जैसे प्यास लगती है तो पानी याद आता है, वैसे ही मृत्यु का बोध हमें जीवन के असली अर्थ की प्यास देता है। जब हम भूल जाते हैं कि हम नश्वर हैं, तब हम अहंकार, विवाद, तुलना, क्रोध जैसी छोटी-छोटी बातों में उलझ जाते हैं, और जब याद आता है कि समय सीमित है, तो अचानक वही बातें हमें महत्वहीन लगने लगती हैं। इसका अर्थ हुआ जितना मृत्यु निकट लगती है, उतना ही जीवन स्पष्ट दिखाई देता है। उतना ही मन शांत होता है। उतना ही हृदय विनम्र होता है क्योंकि तब समझ आता है, न धन साथ जाएगा, न पद, न प्रसिद्धि। साथ जाएगा तो केवल आपका कर्म, आपकी चेतना, और आपका प्रेम।


दोस्तों, आज मैं आपको मृत्यु से डरा नहीं रहा हूँ और ना ही उससे डरने का कह रहा हूँ। मैं तो बस आपको उसे याद रखने को कह रहा हूँ क्योंकि जो मृत्यु को याद रखता है, वही जीवन को सही ढंग से जीता है। वही व्यक्ति दूसरों को चोट पहुँचाने से पहले सोचता है। वही व्यक्ति समय की कीमत समझता है। वही व्यक्ति हर दिन को अंतिम समझकर पूरी सच्चाई से जीता है।


दोस्तों, अगर सार्थक जीवन जीना चाहते हैं तो आज खुद से पूछिए, ‘अगर यह मेरा आख़िरी दिन है, तो क्या मैं वही कर रहा हूँ जो वास्तव में महत्वपूर्ण है?’ अगर उत्तर “नहीं” है, तो आज से बदलना शुरू कीजिए क्योंकि मृत्यु अंत नहीं, स्मरण है और जो इस स्मरण में जीना सीख लेता है, वह हर दिन परमात्मा के और करीब होता चला जाता है। यही जागृति के साथ सच्चा जीवन जीना है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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