सिर्फ़ तेज चलना नहीं बल्कि समय से रुकना सीखें…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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Feb 19, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज की दुनिया में दूर से देखने पर सफलता का एक ही मंत्र नजर आता है, ‘तेज भागो; जल्दी करो, आगे निकलो, सबसे आगे दिखो और फिर उसका डंका पीटो!’ लेकिन जो लोग सही मायने में सफल और सच्चे लीडर हैं वे इस दौड़ को देखकर सिर्फ़ मुस्कुराते हैं क्योंकि वे जानते हैं, ‘तेज दौड़ में अक्सर ज़िंदगी या यूँ कहूँ जीवन के असली लक्ष्य पीछे छूट जाते है।’
दोस्तों, लीडरशिप स्पीड से नहीं, समझ से बनती है। सच्चा लीडर वही है जो रुकना जानता है, सोचना जानता है, और फिर सही समय पर आगे बढ़ना जानता है। उदाहरण के लिए एक सामान्य ड्राइवर जहाँ सफ़र को जल्द और सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए जहाँ सिर्फ़ गति पर फोकस करता है, वहीं एक कुशल ड्राइवर सड़क, मौसम, गाड़ी की स्थिति आदि सब देखने और परखने के बाद गति पर ध्यान देता है। यही अंतर आम व्यक्ति और लीडर में होता है। आम व्यक्ति गति देखता है, लीडर दिशा भी देखता है।
इसलिए मेरा मानना है कि धीमा होना हमेशा कमजोरी नहीं है, कई बार यह निर्णय की परिपक्वता है। जब आप ठहरते हैं तब भावनाएँ शांत होती हैं; सोच साफ होती है; गलतियों की संभावना घटती है और लोगों का भरोसा बढ़ता है। इसलिए ही कहा जाता है कि लीडर रिएक्ट नहीं, रिस्पॉन्ड करता है। जब गुस्से में निर्णय लेते हैं, तो बाद में पछतावा होता है। लेकिन जब सोचकर निर्णय लेते हैं, तो परिणाम चाहे जो हो, अंत में शांति और संतोष रहता है।
माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला को ही देख लीजिए। जिस वक्त उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट की कमान संभाली थी, तब कंपनी तकनीकी की दुनिया में पिछड़ रही थी। उस वक्त कंपनी के लोग उनसे अपेक्षा कर रहे थे वे तुरंत बड़े फैसले लेंगे और मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए आक्रामक बदलाव करेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ करा नहीं। उन्होंने तो बस कर्मचारियों, ग्राहकों और बाजार की बातों को महीनों तक बहुत ध्यान से सुना। फिर गहराई से विचार कर धीरे-धीरे रणनीति बदली और क्लाउड टेक्नोलॉजी पर ध्यान दिया, कंपनी के वर्किंग एन्वायरन्मेंट याने वहाँ की संस्कृति में आवश्यक बदलाव लाए और टीम में विश्वास जगाया। गहराई से योजनाबद्ध तरीके से लाए इस बदलाव ने कंपनी को बड़ा मुनाफ़ा दिया। उन्होंने साबित किया, धीमी शुरुआत, तेज़ सफलता की नींव होती है।
दोस्तों, यकीन मानियेगा अति उत्साह नुकसान भी कर सकता है। आपने देखा ही होगा अक्सर लोग अत्यधिक खुशी में ऐसे वादे कर देते हैं जो बाद में निभा नहीं पाते। याद रखियेगा, जल्दबाज़ी में लिए गए फैसले विश्वसनीयता कम करते हैं। इसलिए लीडर्स जल्दबाजी में फ़ैसले लेने के स्थान पर पहले क्षमता देखते हैं, फिर वादा करते हैं। वे सीधे से नियम का पालन करते हैं, खुश रहो, लेकिन जमीन पर रहो। जश्न छोटा रखो, सीख बड़ी रखो। भावनाएँ दिल में रखो, फैसले दिमाग से लो।
दोस्तों, अच्छा दिल आपको बेहतर इंसान बनाता है, लेकिन अच्छा दिमाग आपको बेहतर लीडर बनाता है। जो व्यक्ति भावनात्मक निर्णय लेता है, वह कहता है, “कर डालो!” लेकिन जो दिमाग़ से डेटा आधारित निर्णय लेता है, वो कहता है, “पहले देख लो।” सच्चा लीडर वही है जो निर्णय भावनाओ से नहीं, तथ्यों से ले।
कुल मिलाकर कहूँ तो दोस्तों, लीडरशिप कोई पद नहीं है, एक आदत है। जब आप गुस्से में प्रतिक्रिया देने के स्थान पर रुक जाते हैं, तब आप लीडर हैं। जब आप उत्साह में भी संतुलित रहते हैं, तब आप लीडर हैं। जब आप असफलता से टूटते नहीं, सीखते हैं, तब आप लीडर हैं। याद रखिए, तेज़ चलने वाले जीत सकते हैं, लेकिन सही समय पर रुकने वाले इतिहास बनाते हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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