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ज्ञान का असली उद्देश्य अंधेरा कम करना है !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 13 minutes ago
  • 3 min read

Feb 17, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, सच्चा ज्ञान किताबों याने पढ़े हुए शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन से मिले अनुभवों से मिलता है। याने जिए गए जीवन से मिला अनुभव भी हमें बहुत कुछ सिखाता है। थोड़ा गहराई से समझा जाये तो शब्दों से लिया ज्ञान पहले हमारे दिमाग़ में जाता है और फिर एक्शन के माध्यम से हमारे जीवन में उतरता है। लेकिन अगर यह सिर्फ़ हमारे दिमाग में रह जाए, तो वह अहंकार बन सकता है और अगर यह हाथों के माध्यम से याने कर्म से हृदय में उतर जाए, तो परोपकार बन जाता है।


चलिए, इस बात को हम एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। बात कई साल पुरानी है, शहर की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी के एक नामी प्रोफेसर, जो अपने विषय के बड़े विद्वान माने जाते थे, अपने हर लेख, अपने हर उद्बोधन में लोगों को कहा करते थे कि, “ज्ञान ही सबसे बड़ा धर्म है।” एक बार एक कांफ्रेंस में उनके बहुत ही शानदार उद्बोधन को सुन यूनिवर्सिटी के पास एक बस्ती, जहाँ के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे, ने उनसे निवेदन किया, “सर, क्या आप हफ्ते में एक दिन इन ग़रीब और अंडर प्रिविलीजेड बच्चों को पढ़ा सकते हैं?” प्रोफेसर मुस्कुराए और बोले, “आजकल मैं शोध में व्यस्त हूँ इसलिए संभव नहीं होगा. साथ ही समाज-सेवा का काम सरकार का है।”


उनकी इस बातचीत को यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में काम करने वाले एक साधारण कर्मचारी ने सुन लिया। वह कर्मचारी प्रोफ़ेसर जितना विद्वान तो नहीं था, पर वह इतना जानता और मानता था कि जो मुझे मिला है, वह बाँटना चाहिए। इस विचार से प्रेरित हो उसने शाम को उन ग़रीब बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उन बच्चों में बदलाव आने लगा और उनमें से कुछ ने स्कूल में प्रवेश लिया, तो कुछ ने छात्रवृत्ति पाई। वर्षों बाद उस कर्मचारी को इस नेक कार्य के लिए विश्वविद्यालय ने सम्मानित किया तो उस प्रोफेसर ने पहली बार महसूस किया, “मैंने ज्ञान तो अर्जित किया, लेकिन उसे जीवन में उतारा नहीं।”


दोस्तों, ख़ुद को अच्छा इंसान साबित करने के लिए सिर्फ यह कहना कि “मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता” पर्याप्त नहीं है। इसके लिए तो आपको ख़ुद से सिर्फ़ एक प्रश्न करना होगा, “क्या मैं किसी के काम आ रहा हूँ?” अगर इसका जवाब हाँ में मिल गया तो सही है अन्यथा आपको इस विषय में और कार्य करना होगा।


दोस्तों, इस सच्चाई को डॉ. वर्गीज़ कुरियन ने अपने जीवन से सिद्ध किया था। वे केवल एक इंजीनियर बनकर आराम से जीवन जी सकते थे। लेकिन उन्होंने अपने ज्ञान को गाँवों तक पहुँचाया। दूध उत्पादन की तकनीक को किसानों के हाथ में दिया और “ऑपरेशन फ्लड” के माध्यम से भारत को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया। अगर वे केवल अपने करियर पर ध्यान देते, तो शायद वे ज़्यादा सफल होते। लेकिन उन्होंने ज्ञान को समाज की सेवा में लगाया और इसलिए वे महान बने।


दोस्तों, ज्ञान का असली उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं है। उसका उद्देश्य है, अंधकार कम करना। अगर आप डॉक्टर हैं, तो आपकी पढ़ाई तब सार्थक है जब आप किसी की जान बचाए। अगर आप शिक्षक हैं, तो आपकी डिग्री तब सार्थक है
जब आप किसी छात्र का भविष्य गढ़े। अगर आप विद्यार्थी हैं, तो आपकी पढ़ाई तब सार्थक है जब वह केवल आपके लिए नहीं, समाज के लिए भी उपयोगी बने।


याद रखिएगा, साधना केवल ध्यान में नहीं है। साधना सेवा में भी है। सच्चा धर्म केवल पूजा में नहीं, परोपकार में प्रकट होता है। दोस्तों अगर महान बनना चाहते हैं तो आज स्वयं से पूछिए, “मेरे ज्ञान से किसका भला हो रहा है? अगर उत्तर अभी स्पष्ट नहीं है, तो चिंता मत कीजिए, आज से शुरुआत कीजिए क्योंकि अंत में जीवन यह नहीं पूछेगा कि आपने कितना सीखा, वह पूछेगा आपने कितना दिया और जो देता है, वही वास्तव में समृद्ध होता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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