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जितना आवश्यक हो, उतना ही सोचें…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 2 min read

Feb 16, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक प्रश्न से करते हैं, “क्या हमारे मन में चल रहा विचार हमें स्वस्थ या बीमार बना सकता है?” सोच में पड़ गए ना? असल में हमने कभी इस विषय में इतना गहराई से सोचा ही नहीं है. अक्सर हम बीमारी का कारण बाहर ढूँढते हैं। जैसे, अभी मौसम खराब है; थोड़ा खानपान बिगड़ गया था; अब तो उम्र हो गई है; हालात और परिस्थिति ही ऐसी है; आदि। लेकिन यह बात कहते वक्त ज्यादातर लोग यह भूल जाते हैं कि सबसे शक्तिशाली दवा या ज़हर हमारा विचार होता है।


दोस्तों, हर नकारात्मक, व्यर्थ और चिंताजनक विचार सबसे पहले हमारे मन को थकाता है, फिर वही थकान शरीर में उतर जाती है। ईर्ष्या, डर, तुलना, क्रोध, भविष्य की चिंता, और अतीत का पछतावा—ये सभी विचार शरीर के भीतर धीरे-धीरे बीमारी का वातावरण बनाते हैं। इसके विपरीत, आत्मा और परमात्मा से जुड़े विचार—शांति, कृतज्ञता, स्वीकार, विश्वास— शरीर को भीतर से मजबूत करते हैं।


इसका अर्थ यह नहीं है कि हम संसार या देह की जिम्मेदारियों से भाग जाएँ। अर्थ सिर्फ़ इतना है कि जितना आवश्यक हो, उतना ही सोचें। बाकी समय अपने भीतर झाँकने में लगाएँ। आत्म-चिंतन में बिताएँ क्योंकि भीतर की शांति ही बाहर की ऊर्जा बनती है।


इसी सत्य को अपने जीवन में गहराई से जिया था Steve Jobs ने। जब उन्हें कैंसर हुआ, तो उन्होंने केवल इलाज पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने अपने जीवन-दृष्टिकोण को भी बदला। उन्होंने कहा था, “मौत का विचार मेरे जीवन का सबसे बड़ा औज़ार रहा है, जिसने मुझे सही निर्णय लेने में मदद की।” उन्होंने व्यर्थ की चिंता छोड़ी, दूसरों को खुश करने की मजबूरी छोड़ी, और हर दिन खुद से पूछा, “अगर आज मेरा आख़िरी दिन हो, तो क्या मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए?” यही प्रश्न उनकी ऊर्जा और स्पष्टता का स्रोत बना।


दोस्तों, आगे बढ़ते रहने के लिए इतना सोचना ही पर्याप्त है कि हमारे जीवन का सर्वोत्तम समय अभी आना शेष है। यह सोच उम्मीद देती है। यह सोच शरीर और मन—दोनों को जीवंत रखती है।


लेकिन जीवन का एक कटु सत्य भी समझिए। माता–पिता अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाते हैं, और कई बार बच्चे इतने “काबिल” बन जाते हैं कि माता–पिता ही उनके लिए अप्रासंगिक हो जाते हैं। यह काबिलियत नहीं, दूरी की बीमारी है। जब विचार केवल “मैं” तक सीमित हो जाते हैं, तो संवेदना कमजोर पड़ जाती है।


इसलिए एक बहुत ज़रूरी बात याद रखिए, खुद को खुद ही खुश रखना सीखिए। यह ज़िम्मेदारी किसी और को मत दीजिए। क्योंकि जो अपनी खुशी दूसरों पर टिका देता है, वह हमेशा असुरक्षित रहता है।


ज़िंदगी परिवर्तन का नाम है। जो बदल रहा है, वह आपको डराने नहीं, गढ़ने आया है। कुछ परिवर्तन आपको सफलता देंगे और कुछ परिवर्तन आपको सफल होने के गुण सिखाएँगे। दोनों ही आवश्यक हैं।


आज से एक छोटा-सा अभ्यास शुरू कीजिए, दिन में कई बार खुद से पूछिए: “इस समय मैं जो सोच रहा हूँ, क्या वह मुझे मजबूत बना रहा है या कमज़ोर?” अगर उत्तर नकारात्मक हो, तो विचार बदलिए क्योंकि विचार बदले बिना जीवन नहीं बदलता। याद रखिए दोस्तों, स्वस्थ शरीर की शुरुआत शांत और सचेत मन से होती है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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