जिएँ जीवन वर्तमान में…
- Nirmal Bhatnagar

- Oct 30, 2025
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Oct 30, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन कोई सीधी, सपाट सड़क नहीं है। यह तो कई उतार-चढ़ाव, मोड़ और ठहराव के बीच से गुज़रती एक यात्रा है। जिसमें हर उतार-चढ़ाव, हर मोड़, हर ठहराव हमें कुछ ना कुछ सिखाने के लिए आता है। कभी ये आपको धैर्य का पाठ पढ़ाता है, तो कभी विनम्रता का, तो कभी आस्था का। लेकिन इस दुनिया में ज्यादातर लोग इससे मिलने वाली सीखों से वंचित रह जाते हैं क्योंकि वे या तो “अतीत के पछतावे” में फँसे रहते हैं या “भविष्य की चिंता” में उलझे रहते हैं और इस भागदौड़ में अपने “आज” को भूल जाते हैं। जबकि यह “आज” ही असलियत में हमारा होता है। इसलिए दोस्तों, मैं सभी से कहता हूँ कि अगर वाक़ई ख़ुश, शांत और संतुष्ट रहते हुए जीना चाहते हो तो सबसे पहले स्वीकारो कि पछतावा अतीत को नहीं बदल सकता और चिंता भविष्य को नहीं सँवार सकती। अतीत और भविष्य के बीच अपने आज को जीना एक ऐसे झूले की सवारी करना है, जो कभी ठहरता ही नहीं। चलिए अपनी बात को मैं आपको एक किस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ-
बात कई साल पुरानी है, एक बार एक साधु नदी के किनारे बैठे थे। तभी एक व्यक्ति, जो बहुत दुखी और परेशान लग रहा था, उनके पास भागता हुआ आया, और बोला, “गुरुदेव, मेरे जीवन में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। हर क्षण मुझे चिंता रहती है कि कल क्या होगा? मैं कभी सफल हो पाऊँगा या नहीं? क्या मैं अपने परिवार को खुश रख पाऊँगा?” उस व्यक्ति का प्रश्न सुन साधु मुस्कुराए और जवाब देने के स्थान पर प्रश्न करते हुए बोले, “तुम्हारे हाथ में क्या है?” उसने कहा, “पत्थर।” साधु उसी मुस्कुराहट के साथ बोले, “उसे नदी में फेंक दो।” उस व्यक्ति ने वैसा ही किया।
उस व्यक्ति के पत्थर फेंकते ही साधु बोले, “जाओ अब उस पत्थर को वापस निकाल लाओ और इस जड़ीबूटी को कूटकर मुझे दो।” आश्चर्य के भाव के साथ वह व्यक्ति बोला,“पत्थर तो डूब गया, उसे निकालना तो असंभव है।” उसके जवाब को सुन साधु बोले, “फिर एक काम करो तुम यहीं किनारे पर बैठ कर नदी के सूखने का इंतज़ार करो। जब नदी में पानी खत्म हो जायेगा तब तुम अपने पत्थर को पहचान कर निकाल लाना।” साधु का जवाब सुन वह शख़्स बोला, “यह कैसी बचकानी बात कर रहे हैं आप? क्या पता यह नदी कभी सूखेगी या नहीं और अगर सुख भी गई तो मैं उस पत्थर को पहचान भी पाऊँगा या नहीं? यहाँ मेरे आस-पास हज़ारों पत्थर पड़े हैं, उनमें से भी एक अच्छे पत्थर को खोज कर अपना काम किया जा सकता है।”
उस व्यक्ति की बात सुन साधु एकदम गंभीर हो गए और फिर धीमी आवाज में बोले, “यही तो जीवन का रहस्य है। जो बीत गया, वह उस पत्थर की तरह है — डूब गया। अब जितना भी खोजोगे, बस समय और ऊर्जा व्यर्थ होगी। इस पल जो तुम्हारे पास है उससे अपने जीवन को संवारो, भविष्य अपने आप सुखद हो जायेगा।” इतना कहकर साधु एकदम शांत हो गए और कुछ क्षणों बाद मुस्कुराते हुए बोले, “अतीत का बोझ छोड़ दो, भविष्य की चिंता नदी की तरह बहने दो, और आज की धूप में कुछ पल मुस्कुरा लो, यही जीवन है।”
दोस्तों, सामान्यतः हम सब भी यही गलती करते हैं। अतीत की गलतियाँ याद कर-करके खुद को सज़ा देते रहते हैं, और इससे फ्री होते हैं तो यह जानने के बाद भी कि भरोसा अगले पल का भी नहीं है, फिर भी भविष्य की अनिश्चितता में इतने उलझ जाते हैं कि आज के आनंद को ही खो देते हैं। याद रखियेगा दोस्तों, जीवन तो इसी पल में धड़कता है। अगर हम हर सुबह उठकर सिर्फ़ इतना सोच लें, “आज मैं आभारी हूँ”, “आज मैं मुस्कुराऊँगा”, “आज मैं अपने जीवन में कुछ अच्छा जोड़ूँगा”, तो धीरे-धीरे यही ‘आज’ मिलकर हमारा सुंदर भविष्य बन जाएगा।
दोस्तों, वर्तमान में जीना कोई सिद्धांत नहीं, एक साधना है। इसके लिए आपको ध्यान में बैठने की ज़रूरत नहीं, बस सजग रहने की ज़रूरत है। याने सजग रहते हुए अपने आस-पास हो रही घटनाओं को महसूस करने की ज़रूरत है। जैसे कभी बच्चे की हँसी को महसूस करें, कभी पेड़ की छाँव में कुछ देर ठहरें, कभी किसी की बिना कारण के मदद करें, तब जल्द ही आप देखेंगे कि जीवन कितना हल्का और सुंदर हो गया है। शायद इसीलिए कहा गया है, “सुख कोई मंज़िल नहीं, बल्कि रास्ते का एहसास है। इसलिए अतीत को माफ़ कर दें, भविष्य को ईश्वर पर छोड़ दें, और वर्तमान में हर पल को प्रेम और कृतज्ञता से जिएँ क्योंकि सच में “आज” ही हमारा सबसे सुंदर उपहार है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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