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जिसे आप बाहर खोज रहे हैं, वह आपके अंदर ही है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

Mar 25, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट के इस युग में, जहाँ हर जानकारी हमारी उंगलियों पर उपलब्ध है। जिसकी सहायता से हम कभी भी, कहीं भी, कुछ भी जान सकते हैं। हम दुनिया के देशों के बारे में जानते हैं, टेक्नोलॉजी के बारे में जानते हैं, दूसरों के जीवन के बारे में भी बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन तेज भागती इस दुनिया में हम ख़ुद कब पीछे छूट गए इसका हमें एहसास ही नहीं हुआ। सीधे शब्दों में कहूँ तो आज हम तेज जानकारी की उपलब्धता के कारण दुनिया को तो जान गए, पर खुद को जानने का मौका कुछ हद तक चूक गए। इसीलिए मेरा मानना है कि जीवन का सबसे गहरा प्रश्न है, “मैं कौन हूँ?”


चलिए, एक प्रेरणादायक प्रसंग से इस प्रश्न को गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। अपने समय के रामपुर के अजेय राजा के जीवन में ईश्वर से मिलने की एकमात्र इच्छा बची थी। इसलिए हर मिलने वाले से वे एक ही बात साझा किया करते थे, “मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूँ।” एक दिन एक सन्यासी उनके राज्य में आए, तो राजा तुरंत उनके पास पहुँचे और बोले, “महात्मन! मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूँ। अगर आप मुझे मिलवा सकते हों तो बताइए। लेकिन एक बात याद रखियेगा, मुझे समझाइए मत, बस मुझे ईश्वर से मिलवाइएगा।”


राजा की बात सुन संन्यासी मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “बिल्कुल! मैं तुम्हें आज और अभी इसी वक्त ईश्वर से मिलवा सकता हूँ। बस मुझे एक कागज पर अपनी पहचान लिख दो, जिससे मैं उस पर्ची को ईश्वर को देकर यह बता सकूँ कि उनसे मिलने कौन आ रहा है।” राजा ने तुरंत कहा, “मैं।” संन्यासी ने राजा को एक कागज दिया और कहा, “ऐसे नहीं अपना परिचय लिखो।” राजा ने उसी क्षण कागज पर अपना नाम, पद, वंश, उम्र और अपनी उपलब्धियाँ लिख कर दे दी। जिसे पढ़ते ही संन्यासी बोले, “राजन, इस नाम, पद, उम्र और उपलब्धियों के मिलने के पहले भी तुम थे और इनके छिन जाने के बाद भी तुम रहोगे। यह सब तो बदलने वाली चीज़ें हैं और जो बदलता है, वह तुम कैसे हो सकते हो? जरा अपनी असलियत बताओ कि वास्तव में तुम हो कौन?”


राजा एकदम अवाक थे। उन्हें चुप देख संन्यासी ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा, “राजन, जब तुम्हारा नाम नहीं था, तब भी तुम थे। जब तुम राजा नहीं थे, तब भी तुम थे। जब तुम्हारी उम्र बढ़ी, तब भी तुम वही रहे। तो यह सब तुम्हारा परिचय कैसे हो सकता है?” संन्यासी की बातों की गहराई समझ राजा अब भीतर झाँकने लगा था। संन्यासी ने उन्हें समझाते हुए कहा, “याद रखो राजन, जो बदलता है, वह तुम नहीं हो। जो दिखाई देता है, वह तुम नहीं हो। जो आता-जाता है, वह तुम नहीं हो। तुम वह हो, जो इन सबको देख रहा है… जो हर परिवर्तन का साक्षी है।” अब राजा की आँखों में नई चमक थी, जिसे देख संन्यासी बोले, “तुम ईश्वर को बाहर खोज रहे हो, जबकि वह तुम्हारे भीतर ही है। जिस दिन तुम खुद को जान लोगे, उसी दिन ईश्वर को भी जान लोगे।”


दोस्तों, यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है, हम गूगल पर हर सवाल का जवाब ढूँढ लेते हैं, लेकिन अपने भीतर उठने वाले सबसे महत्वपूर्ण सवाल से बचते रहते हैं। इसी गहराई को अपने जीवन में जिया आदि शंकराचार्य ने। उन्होंने कहा था, “ब्रह्म सत्य है, और वही आत्मा है।” अर्थात् जो परम सत्य है, वही हमारे भीतर भी है। याद रखियेगा, जिस नाम, रिश्ते, काम और पहचान से हमने ख़ुद को जोड़ रखा है, वह सब अस्थायी है। आज यह हमारे साथ हैं, कल बदल जाएँगे। हम तो सिर्फ़ ‘वो’ हैं जो भीतर से महसूस करते हैं। इसलिए जीवन में थोड़ा समय खुद के लिए निकालिए और अपने भीतर झाँकिए क्योंकि जिस दिन आपने यह जान लिया कि, “मैं कौन हूँ”, उस दिन आपको किसी और उत्तर की आवश्यकता नहीं रहेगी। उस दिन आप समझ जाएँगे कि जिस ईश्वर को आप बाहर खोज रहे थे, वह हमेशा से आपके भीतर ही मौजूद था।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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