सही ज्ञान ही जीवन को दिशा देता है…
- Nirmal Bhatnagar

- 16 hours ago
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Mar 24, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, यकीन मानियेगा असफलता, चुनौतियों, आदि से भी ज़्यादा ख़तरनाक बिना सोचे समझे मान लेना है। मैं तो इसे जीवन का सबसे बड़ा खतरा मानता हूँ। जब हम बिना सही बात या सत्य जाने, बिना परख किए, किसी बात को स्वीकार कर लेते हैं, वहीं से “अविद्या” शुरू होती है। चलिए, इसे हमे अकबर और बीरबल के एक बेहद रोचक प्रसंग से समझने का प्रयास करते है।
एक दिन बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल, यह अविद्या क्या होती है?” बीरबल मुस्कुराया और बोला, “जहाँपनाह, इसका उत्तर देने के लिए मुझे कुछ दिन दीजिए।” अकबर ने अनुमति दे दी। बीरबल ने एक योजना बनाई और वह राज दरबार से छुट्टी लेकर एक मोची के पास गया और बोला, “तुम्हें दो दिन में सोने-चाँदी की कारीगरी के साथ डेढ़ फुट लंबी और एक बित्ता चौड़ी जूती बनानी है और हाँ एक बात ध्यान रखना, अगर किसी को इस विषय में बता चला तो तुम दंड के अधिकारी होगे।”
मोची ने हाँ में सर हिलाया और फिर अगले ही दिन बीरबल के आदेशानुसार अजीब और अनोखी जूती बना दी। बीरबल ने उस रात एक जूती अपने पास रख ली और दूसरी रात के अंधेरे में मस्जिद में रखवा दी। सुबह जब मौलवी मस्जिद पहुँचे, तो उन्होंने वह जूती देखी। जूती इतनी अनोखी थी कि उन्होंने सोचा, “यह किसी इंसान की नहीं हो सकती… यह तो खुदा की ही होगी!” विचार आते ही उन्होंने उसे सिर पर रखा, चूमा, और श्रद्धा से भर गए। धीरे-धीरे यह बात फैल गई और लोग बिना सोचे-समझे उसे “अल्लाह की जूती” मानकर देखने के लिए आने लगे। हर कोई उसे सम्मान दे रहा था; माथे पर लगा रहा था।
कुछ ही दिनों में यह बात अकबर तक पहुँची। उन्होंने भी बिना जाँच किए उसे “खुदा की जूती” मान लिया और सम्मान किया। इस घटना के कुछ दिन बाद बीरबल बड़ा उदास चेहरा लिए दरबार पहुंचा। उसे इस तरह देख अकबर ने पूछा, “क्या हुआ?” बीरबल बोला, “जहाँपनाह, हमारे घर से हमारे पूर्वजों की एक जूती चोरी हो गई।” और उसने अपने पास रखी दूसरी जूती दिखा दी। जिसे देख अकबर चौंक गए और उन्होंने तुरंत मस्जिद से दूसरी जूती मंगवाई। दोनों जूतियाँ बिल्कुल एक जैसी थी। अब अकबर को अपनी भूल का एहसास हो चुका था। तभी बीरबल अपने स्थान पर खड़े हुए और बड़े शांत स्वर में बोले, “जहाँपनाह, बिना जाने, बिना परखे, सिर्फ दूसरों को देखकर किसी बात को मान लेना ही अविद्या है। यही भेड़चाल है।”
दोस्तों, यही आज के जीवन की भी सच्चाई है। हम अक्सर बिना सोचे-समझे दूसरों की बातों को सच मान लेते हैं और अक्सर अफवाहों पर विश्वास कर, भीड़ के साथ चल पड़ते हैं। इसी तरह कई बार हम बिना सत्य जाने निर्णय ले लेते हैं और इस अविद्या के कारण कई बार गलत दिशा में चले जाते हैं। इसी बात को समझाते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “किसी भी बात को आँख बंद करके मत मानो। पहले उसे परखो, समझो, अनुभव करो, तब स्वीकारो।” उन्होंने युवाओं को सिखाया कि अंधविश्वास नहीं, विवेक ही जीवन का मार्गदर्शक होना चाहिए।
दोस्तों, ज्ञानी होने का अर्थ केवल जानकारी रखनेवाला होना नहीं है, ज्ञानी होने का अर्थ है, सही और गलत में अंतर करने की क्षमता अपने अंदर विकसित कर लेना। इसलिए जीवन में हर बात को स्वीकार करने से पहले एक पल रुकिए, सोचिए, समझिए।
दोस्तों, भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, लेकिन सत्य का मार्ग चुनना ही असली बुद्धिमानी है। इसलिए हमेशा याद रखिएगा, अविद्या हमें भीड़ में खो देती है, और विवेक हमें पहचान देता है। इसलिए आज से एक संकल्प लें, हम सुनेंगे जरूर, लेकिन मानेंगे तभी, जब उसे गहराई से समझ जाएँगे क्योंकि सही ज्ञान ही जीवन को दिशा देता है, और वही हमें भीड़ से अलग बनाता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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