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जीवन की सबसे बड़ी कला स्वीकार करना है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

Mar 26, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, बदलाव के इस दौर में हमारा पूरा जीवन एक दौड़ बन कर रह गया है। हममें से ज्यादातर लोग कुछ पाने की दौड़ में शामिल हैं, तो कुछ बनने की दौड़ में, तो कुछ साबित करने की दौड़ में। इतना ही नहीं, जब हमें अपने समान और लोग दौड़ते हुए नजर आते हैं तो हम सोचते हैं कि अगर हम और तेज़ भागेंगे, और ज्यादा चाहेंगे, तो बाकियों को पीछे छोड़ने के साथ-साथ जीवन में सब कुछ हासिल कर लेंगे। लेकिन इस दौड़ में हम जीवन की एक गहरी सच्चाई को भूल जाते हैं कि जिस चीज़ के पीछे हम जितना भागते हैं, वह उतनी ही दूर भागती जाती है। उदाहरण के लिए हम कहते हैं, “मुझे शांति चाहिए…” पर इस चाहत के साथ ही हमारा मन और अशांत हो जाता है। हम कहते हैं, “मुझे खुश रहना है…” पर यह चाहत हमारे भीतर बेचैनी बढ़ा देती है। इसी तरह हम कहते हैं, “मैं सब कुछ छोड़ देना चाहता हूँ…”, पर यह सोच हमारी आसक्ति को और बढ़ा देती है और हम उन्हीं चीजों की चाह में और जकड़ जाते हैं।


जानते हैं दोस्तों ऐसा क्यों होता है? क्योंकि “चाह” अपने आप में एक तनाव है। चाह का मतलब है, “जो अभी है, वह पर्याप्त नहीं है…” और जैसे ही हम यह मान लेते हैं कि “अभी” ठीक नहीं है, वैसे ही हम वर्तमान से दूर हो जाते हैं। एक छोटी सी घटना से इसे बहुत ही सहज और सरल तरीके से समझाने का प्रयास करता हूँ-


कई साल पहले की बात है एक व्यक्ति एक संत के पास गया और बोला, “मुझे शांति चाहिए, मैं बहुत परेशान हूँ।” संत ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, पहले ‘मुझे’ और ‘चाहिए’ इन दो शब्दों को हटा दो, फिर जो बचेगा वही शांति है।” संत का उत्तर सुनते ही वह व्यक्ति चुप हो गया।


दोस्तों, समस्या बाहर नहीं है। समस्या हमारी उस लगातार चलने वाली चाह में है, जो हमें वर्तमान से दूर ले जाती है। हम सोचते हैं, “जब सब ठीक होगा, तब मैं खुश रहूँगा…”, “जब यह मिल जाएगा, तब मैं शांत हो जाऊँगा…”, जब परिस्थितियाँ बदलेंगी, तब मैं सुकून में आऊँगा…”, लेकिन जीवन का नियम कुछ और ही है - जो है, उसे स्वीकार किए बिना, जो चाहिए वह कभी नहीं मिलेगा। इसी सत्य को अपने जीवन में गहराई से लाओ त्सू ने जिया था। उन्होंने कहा था, “जब मैं जो हूँ, उसे स्वीकार कर लेता हूँ, तब मैं वह बन जाता हूँ जो मैं बन सकता हूँ।”


दोस्तों, जीवन में सबसे बड़ी कला स्वीकार करना है। लेकिन आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि स्वीकार करना हार मानना नहीं है, बल्कि वास्तविकता के साथ तालमेल बैठाना है। जब आप वर्तमान को स्वीकार करते हैं, तो मन शांत होने लगता है। जब मन शांत होता है, तो निर्णय स्पष्ट होने लगते हैं और जब निर्णय स्पष्ट होते हैं, तो जीवन सहज होने लगता है। याद रखिएगा, सुख कोई भविष्य की घटना नहीं है, सुख तो वर्तमान की स्वीकृति में छिपा है। आप जितना भविष्य की चिंता करेंगे, उतना वर्तमान हाथ से निकलता जाएगा और जो व्यक्ति वर्तमान खो देता है, वह जीवन की सबसे बड़ी पूंजी खो देता है।


इसलिए आज से एक छोटा सा बदलाव कीजिए और दौड़ना थोड़ा कम कीजिए और जीवन में थोड़ा ठहराव लाना सीखिए। साथ ही आपके पास जो है, उसे महसूस करना शुरू कीजिए क्योंकि सच यही है, जीवन को पाने की नहीं, जीवन को जीने की आवश्यकता है और जिस दिन आप यह समझ जाएंगे, उस दिन आपको भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि आप वहीं पहुँच जाएंगे, जहाँ आपको हमेशा से होना चाहिए था, अपने भीतर, अपने वर्तमान में, अपने वास्तविक स्वरूप में।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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