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जीवन की बगिया में खिलायें फूल…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 10 hours ago
  • 3 min read

July 7, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, चलिए आज कुछ प्रश्नों से शो की शुरुआत करते हैं। मान लीजिए, आपको किसी से उपहार में कोई ज़मीन मिल जाये तो आप उस पर क्या उगाना पसंद करेंगे? काँटे, झाड़ियाँ, घास-फूस या फूल, पौधे, सब्जियां और अनाज। निश्चित तौर पर आप दूसरे ऑप्शन को चुनेंगे। चलिए, अब दूसरे प्रश्न का जवाब दीजिए, फूल-पौधे, सब्जी या अनाज उगाने के विषय में सिर्फ़ सोचना, उसके लिए सिर्फ़ योजना बनाना और दूसरों से इस योजना में मदद की अपेक्षा रखना अंत में उस ज़मीन पर क्या उगाएगा? अब आप कहेंगे काँटे, झाड़ियाँ और घास-फूस और अगर मैं आपसे इसकी वजह पूछूँगा तो आप बतायेंगे कि सोचने और योजना बनाने से कुछ नहीं होता। अगर ज़मीन पर फल-फूल, अनाज आदि उगाना है तो प्रतिदिन थोड़ा-सा समय देकर, बीज बोना होंगे फिर, पानी देना, खरपतवार हटाना और अंत में धैर्य रखना होगा तब आप उस ज़मीन को एक सुंदर बगीचे में बदल सकते हैं।


दोस्तों, हमारा जीवन भी बिल्कुल ऐसा ही है। लेकिन फिर भी ईश्वर से उपहार में जीवन मिलने के बाद भी बहुत से लोग सोचते हैं कि एक दिन अचानक सब कुछ अच्छा हो जाएगा। परिस्थितियाँ बदल जाएँगी, लोग बदल जाएँगे, किस्मत बदल जाएगी और जीवन अपने आप सुंदर हो जाएगा। लेकिन जीवन में सुंदरता कभी संयोग से नहीं आती। वह हमारे रोज़ के छोटे-छोटे चुनावों से पैदा होती है। एक मुस्कान, एक धन्यवाद, किसी की गलती को माफ़ कर देना, किसी की बात धैर्य से सुन लेना, अपनी सुविधा छोड़कर किसी का साथ देना, आदि वे छोटी-छोटी बातें हैं, जो सुनने में साधारण लग सकती हैं लेकिन अगर इनका प्रयोग रोज़मर्रा के जीवन में किया जाये तो ये हमारे जीवन के बगीचे में सुन्दर फूल खिला सकती हैं। वहीं दूसरी ओर शिकायत, तुलना, अहंकार और कटुता ऐसे खरपतवार हैं, जिसपर ध्यान ना दिया जाये तो ये धीरे-धीरे पूरे बगीचे की सुंदरता को खत्म कर देते हैं; उसके फूलों को उजाड़ देते हैं। ज़मीन पर जिस तरह फूल उगाने के लिए मेहनत करना पड़ती है और खरपतवार अपने आप उग जाती है, ठीक वैसे ही जीवन को सुंदर और उपयोगी बनाने के लिए सजग रहते हुए कार्य करना होता है अन्यथा वह बर्बाद अपने आप हो जाता है।


दोस्तों, इसी तरह रिश्तों का भी अपना एक बगीचा होता है। अक्सर लोग अक्सर पूछते हैं कि दोस्ती बड़ी होती है या रिश्ता? मेरी नजर में शायद यह प्रश्न ही अधूरा है। दोस्ती और रिश्ते प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक हैं। जहाँ सच्ची दोस्ती होती है, वहाँ समझौता अहंकार से बड़ा होता है। जहाँ सच्चा रिश्ता होता है, वहाँ त्याग अधिकार से बड़ा होता है। कोई रिश्ता केवल इसलिए नहीं चलता कि दो लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। वह इसलिए चलता है क्योंकि दोनों यह निर्णय लेते हैं कि किसी भी बहस से अधिक महत्वपूर्ण उनका संबंध है।


आज समाज में ज्यादातर लोग अपने जीवन को अगले पड़ाव याने भविष्य में जीना चाहते हैं। वे सोचते हैं, “ख़ुशी पदोन्नति के बाद मिलेगी”, “जब बड़ा घर होगा तब सुकून मिलेगा”, “जब समस्याएँ समाप्त होंगी तब जीवन अच्छा होगा।” लेकिन प्रकृति हमें बिल्कुल अलग पाठ पढ़ाती है। क्या आपने कभी किसी पेड़ को यह शिकायत करते देखा है कि अभी बसंत क्यों नहीं आया? इसी तरह क्या बारिश यह सोचकर बरसना बंद कर देती है कि लोग उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहे? प्रकृति का हर मौसम अपना काम करता है। गर्मी पेड़ की जड़ों को मजबूत करती है, वर्षा उसे पोषण देती है और पतझड़ उसे अनावश्यक बोझ छोड़ना सिखाता है।


मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। संघर्ष हमें मजबूत बनाते हैं, प्रतीक्षा हमें धैर्य सिखाती है, असफलताएँ हमें विनम्र बनाती हैं और सफलताएँ हमें जिम्मेदार बनाती हैं। इसलिए अपने वर्तमान को केवल मंज़िल तक पहुँचने का इंतज़ार मत बनाइए और याद रखिए, वर्तमान समय ही आपके व्यक्तित्व की खेती कर रहा है। दोस्तों, जीवन की गुणवत्ता इस बात से तय नहीं होती कि आपके पास कितना है, बल्कि इस बात से तय होती है कि आपके पास जो कुछ भी है, आप उसकी देखभाल कैसे करते हैं। इसलिए जीवन को बगीचा मान अगर आप उसमें प्रेम बोएँगे, उसे धैर्य से सींचेंगे, क्षमा की खाद देंगे और कृतज्ञता की धूप पहुँचाएँगे, तो समय आने पर उसमें खुशियों के फूल अवश्य खिलेंगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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