तालियाँ चरित्र का प्रमाण नहीं होती !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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July 31, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, प्रख्यात अंतराष्ट्रीय यूनिवर्सिटी द्वारा कराई गई स्टडी में लोगों को दो विकल्पों में से एक को चुनने को कहा गया। पहले विकल्प में उन्हें बताया गया कि आपको 1 लाख रुपये प्रति माह और आपके साथी सहकर्मी को 75000 रुपये प्रति माह दिए जायें या दूसरे विकल्प के रूप में आपको 1 लाख 25 हज़ार और आपके साथी सहकर्मी को 1 लाख 50 हज़ार रुपये प्रतिमाह दिए जायें तो आप कौनसा विकल्प चुनेंगे? दोस्तों आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 70% से ज़्यादा लोगों ने पहले विकल्प को चुना। इस स्टडी से एक बात एकदम स्पष्ट तौर पर नजर आती है कि वर्तमान सामाजिक परिवेश में हमारे समाज में एक अजीब सी प्रतिस्पर्धा चल रही है। आज ज्यादातर लोग अपनी ऊर्जा को ख़ुद को आगे बढ़ाने से ज्यादा इस बात में खर्च कर रहे हैं कि दूसरा आगे ना बढ़ सके। किसी की सफलता की खबर मिलते ही लोग बधाई देने के बजाय उसके भाग्य, संपर्क या परिस्थितियों पर चर्चा करना शुरू कर देते है और उसके गुणों को स्वीकार करने के बजाय, उसकी कमियों को खोजने लगते हैं।
ऐसी स्थिति में मेरे मन में एक सवाल उठता है कि क्या किसी और को ज़्यादा तनख़्वाह या प्रशंसा ज्यादा मिल जाने से हमारी क़ीमत कम हो जाती है? मेरी नजर में तो नहीं क्योंकि सच्चाई तो सिर्फ इतनी है कि जो व्यक्ति दूसरों की बढ़ती तारीफ़ों, उपलब्धियों या लोकप्रियता से डरता है, वह स्वयं कभी इन चीजों को पा नहीं पाता है। जब एक जलता हुआ दीपक दूसरे दीपक को जलाता है, तो उसका प्रकाश कम नहीं होता। बल्कि अंधेरा थोड़ा और कम हो जाता है। ठीक उसी प्रकार, किसी की सच्ची प्रशंसा करने से हमारा सम्मान घटता नहीं, हमारा व्यक्तित्व बड़ा हो जाता है।
सहमत ना हों तो भगवान श्रीराम के जीवन को याद करके देख लीजिएगा। युद्धभूमि में जब रावण मरणासन्न स्थिति में था, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि जाकर उनसे ज्ञान प्राप्त करो। सोचिए, जिससे दुश्मनी थी, जिसे युद्ध में हराया था, उसी के ज्ञान का सम्मान भी किया। यह केवल विनम्रता नहीं थी, यह चरित्र की ऊँचाई थी। महान व्यक्ति अपने विरोधियों के गुणों को भी स्वीकार करने का साहस रखते हैं। लेकिन ऐसा आप अपने अहंकार को हरा कर ही कर सकते हैं।
याद रखें, प्रशंसा एक दवा भी है और एक नशा भी। यदि वह दूसरों को दी जाए, तो रिश्तों में विश्वास पैदा करती है। यदि वह स्वयं को अधिक मिलने लगे, तो भीतर अहंकार पैदा करती है। इसी वजह से चाणक्य ने कहा था, “अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।” बाहरी शत्रु केवल आपका नुकसान कर सकता है, लेकिन अहंकार आपकी सीखने की क्षमता छीन लेता है।
दोस्तों, आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ लोग प्रशंसा पाने के लिए काम अधिक और दिखावा उससे भी अधिक करते हैं। सोशल मीडिया पर तालियों की संख्या ने कई लोगों के आत्ममूल्य का स्थान ले लिया है। लेकिन याद रखिए, ताली चरित्र का प्रमाण नहीं होती। प्रकृति को ही देख लीजिए, पेड़ कभी अपने फलों का विज्ञापन नहीं करता। नदी कभी अपने जल का परिचय नहीं देती। सूर्य कभी यह घोषणा नहीं करता कि उसने अंधकार मिटा दिया। उनका काम ही उनकी पहचान बन जाता है। मनुष्य को भी ऐसा ही बनना चाहिए।
दोस्तों, यदि आप सचमुच अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाना चाहते हैं, तो आज से अच्छे गुणों या अच्छाई को देखते ही उसकी दिल खोलकर प्रशंसा करना शुरू कीजिए क्योंकि जहाँ गुणों का सम्मान होता है, वहीं विश्वास जन्म लेता है और जहाँ विश्वास होता है, वहीं परिवर्तन संभव होता है। इसके विपरीत अगर कोई आपकी प्रशंसा करे, तो उसे अपने सिर पर चढ़ने देने के स्थान पर कर्तव्य की याद दिलाने वाले संदेश की तरह स्वीकारें।
याद रखिएगा, ईर्ष्या आपको भीड़ का हिस्सा बनाती है, लेकिन प्रशंसा आपको महान लोगों की श्रेणी में खड़ा कर देती है। दूसरों के गुणों को स्वीकार करना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि आत्मविकास का सबसे शक्तिशाली साधन है। जिस दिन आप दूसरों की सफलता पर उतनी ही खुशी महसूस करने लगेंगे, जितनी अपनी सफलता पर करते हैं, उसी दिन आपका व्यक्तित्व साधारण से असाधारण बनना शुरू हो जाएगा।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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