देना ही जीवन का सबसे सुंदर धर्म है !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 10 hours ago
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Aug 1, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, प्रकृति इंसान की इच्छाओं के अनुसार नहीं, अपने नियमों से चलती है। जैसे, इंसान केवल अपने हितों, अपनी इच्छाओं, अपनी प्राथमिकताओं की पूर्ति के लिए जीते हुए असीमित बढ़ना चाहता है। जबकि प्रकृति के नियम के अनुसार जो ख़ुद के लिए जीता है, उसका अस्तित्व सीमित रहता है और जो दूसरों को साथ लेकर बढ़ता है, वो अपने जीवन की सीमाओं से भी बड़ा हो जाता है। उदाहरण के लिए एक बीज को ही लेकर देख लीजिए, जब तक वो स्वयं को बचाकर रखता है, तब तक वो बीज ही रहता है। लेकिन जिस दिन वह स्वयं को समर्पित कर देता है, उसी दिन से वो फलों से लदे वृक्ष बनने की यात्रा शुरू कर देता है।
त्याग का यही नियम मनुष्य पर भी लागू होता है। जीवन का वास्तविक विस्तार संग्रह से नहीं, समर्पण से होता है। हम रोज़ प्रकृति से सीखते हैं, लेकिन शायद ही कभी उस पर विचार करते हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते। नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती। सूर्य अपने प्रकाश का मूल्य नहीं माँगता। बादल बरसने से पहले यह नहीं पूछते कि नीचे कौन खड़ा है। प्रकृति का हर तत्व हमें एक ही संदेश देता है, “देना ही जीवन का सबसे सुंदर धर्म है।” शायद इसी वजह से भारतीय संस्कृति में केवल पूजा करने वालो को महान नहीं माना, बल्कि सेवा करने वालो को देवतुल्य कहा जाता है । यहाँ देवता वह है जो दूसरों का जीवन समृद्ध करे, जो किसी के आँसू पोंछे, किसी की भूख मिटाए, किसी को शिक्षा दे, किसी को आशा दे। याने जो ईश्वर के कार्य में सहभागी बनता है, वही देवता होता है।
स्वामी विवेकानंद ने इसी बात के महत्व को समझाते हुए कहा था, “नर सेवा ही नारायण सेवा है।” अर्थात् जब हम किसी मनुष्य की पीड़ा कम करते हैं, तब वास्तव में ईश्वर की ही पूजा कर रहे होते हैं। लेकिन सेवा का मार्ग जितना पवित्र है, उतना ही कठिन भी है क्योंकि इस मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, अहंकार के रूप में हमारे भीतर बैठा होता है। कई बार व्यक्ति सेवा तो करता है, लेकिन धीरे-धीरे उसे यह लगने लगता है कि समाज उसके कारण चल रहा है। उसे अपने योगदान का बोध नहीं, बल्कि अभिमान होने लगता है। उसी क्षण सेवा, सेवा नहीं रहती। महाभारत में भीष्म, रामायण में रावण और पुराणों में इंद्र, इन सबकी कथाएँ हमें अलग-अलग रूपों में यही बताती हैं कि सामर्थ्य कभी पतन का कारण नहीं बनता, लेकिन सामर्थ्य का अभिमान अवश्य पतन का कारण बन जाता है।
दोस्तों, इसे ग़लत मत समझिएगा, ईश्वर कभी भी किसी की शक्ति नहीं छीनते, वे तो बस पहले उसका अहंकार तोड़ते हैं, ताकि वह अपनी वास्तविक सीमा पहचान सके। यही कारण है कि इतिहास उन लोगों को अधिक याद रखता है जिन्होंने अपने नाम के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए काम किया। उदाहरण के लिए आप बाबा आम्टे, डॉ. कलाम आदि को ही ले लीजिए इनकी महानता केवल उपलब्धियों में नहीं थी, बल्कि इस बात में थी कि इन्होंने अपने ज्ञान, समय और जीवन को समाज के लिए समर्पित कर दिया। यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि जीवन के अंत में यह मायने नहीं रखता कि आपके बैंक खाते में कितना धन है, आपको कितने पुरस्कार मिले या कितने लोग आपकी प्रशंसा करते है। अंत में तो लोग केवल इतना याद रखते हैं कि आपकी उपस्थिति से कितने जीवन बेहतर बने। इसलिए कहते हैं, लेने से जीवन चलता है, लेकिन देने से जीवन सार्थक बनता है।
दोस्तों, ईश्वर हर किसी को ना तो धनवान बनाते है और ना ही प्रसिद्ध; लेकिन वे लगभग हर व्यक्ति को किसी-न-किसी रूप में किसी और के जीवन में प्रकाश बनने का अवसर अवश्य देते हैं। जिस दिन आप उस अवसर को पहचान लेते हैं उसी दिन आप अपने जीवन से अहंकार ख़त्म कर, जीवन को सार्थक बना लेते हैं और समाज की ही नहीं बल्कि ईश्वर की दृष्टि में भी देवतुल्य बन जाते हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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