निस्वार्थ सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती!!!
- Nirmal Bhatnagar

- 13 minutes ago
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May 18, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज की दुनिया में अधिकांश रिश्ते और व्यवहार “लेन-देन” पर टिके हुए दिखाई देते हैं। अगर हमने किसी के लिए कुछ किया, तो मन के किसी कोने में यह उम्मीद भी जन्म लेने लगती है कि सामने वाला भी हमारे लिए कुछ करेगा, हमारा सम्मान करेगा या कम-से-कम हमारा एहसान याद रखेगा। लेकिन सच यह है कि जहाँ से अपेक्षा शुरू होती है, वहीं से सेवा का भाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है क्योंकि सेवा का अर्थ “सौदा” नहीं होता… सेवा का अर्थ होता है, बिना किसी स्वार्थ के किसी के जीवन में थोड़ा प्रकाश पहुँचा देना।
बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में एक बुज़ुर्ग शिक्षक रहते थे। उनके पास ना तो ख़ुद का घर था और ना ही धन संपत्ति, लेकिन इसके बाद भी वे गाँव के बच्चों को प्रतिदिन शाम के समय मुफ्त में पढ़ाया करते थे। अक्सर गांव के लोग उन्हें ट्यूशन फीस लेने की सलाह देते हुए उनसे कहते थे, “गुरुजी, आज आपके पढ़ाये हुए बच्चे जीवन में अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन आप आज भी उसी हाल में हैं। कम से कम अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आवश्यक फ़ीस तो बच्चों से लिया करें।” लोगों की इस सलाह को वे अक्सर हंस कर टाल दिया करते थे। एक बार गाँव के सरपंच ने उनसे कहा, “गुरुजी, आप इतने बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं, बदले में आपको मिलता क्या है?” प्रश्न सुन पहले तो वे मुस्कुराये, फिर एकदम गंभीर स्वर में बोले, “अगर मैं बदले की सोचकर पढ़ाऊँ, तो यह शिक्षा नहीं व्यापार बन जाएगा।”
इसी तरह समय बीतता गया और उनके पढ़ाए हुए बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, शिक्षक, अधिकारी और व्यापारी बन गए। इतना ही नहीं उनमें से तो कई बच्चे शहर चले गए। कुछ वर्षों बाद वह बुज़ुर्ग शिक्षक बीमार पड़ गए और उनके लिए खुदका जीवन चलाना भी असंभव हो गया। उनकी ऐसी हालात को देख कर गाँव वालों को लगा कि अब शायद कोई उनकी सुध नहीं लेगा। लेकिन जल्द ही उनकी यह धारणा टूट गई। एक दिन सुबह-सुबह गाँव के बाहर कई गाड़ियाँ एक साथ आकर रुकीं और उनमें से उनके पढ़ाए हुए बच्चे उतरे। इन बच्चों में अब कोई डॉक्टर बन चुका था, कोई प्रशासनिक अधिकारी, तो कोई सफल व्यापारी। वे सभी बीमार गुरुजी के पास जाकर बैठ गए। सबकी आँखों में आँसू थे। कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उनके चरणों के पास बैठा एक छात्र बोला, “गुरुजी, आज हम सभी जहाँ भी हैं सिर्फ़ और सिर्फ़ आपकी वजह से हैं। आपने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं, आपने हमें इंसान बनाया है।” उस दिन गाँव वालों ने पहली बार समझा कि निस्वार्थ सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती।
दोस्तों, सेवा का वास्तविक फल इंसान नहीं दे सकता क्योंकि इंसान अक्सर भूल जाता है, लेकिन जीवन कभी नहीं भूलता। आज लोग सेवा भी प्रसिद्धि के लिए करने लगे हैं। किसी की मदद करते हैं तो तस्वीरें खिंचवाते हैं, सोशल मीडिया पर डालते हैं, और चाहते हैं कि दुनिया उनकी प्रशंसा करे। लेकिन याद रखिए, जिस सेवा को दुनिया की तालियों की आवश्यकता हो, वह अभी पूर्ण सेवा नहीं है। सच्ची सेवा वह होती है, जो शांति देती है, अहंकार नहीं बढ़ाती। जब आप किसी की मदद करके भीतर से हल्का महसूस करें, तभी समझिए कि सेवा सही दिशा में हुई है।
दोस्तों, इस संसार में सबसे सुंदर लोग वे नहीं होते जिनके पास सबसे अधिक धन होता है, बल्कि वे होते हैं जिनके भीतर देने का भाव जीवित होता है। याद रखिएगा, लेने वाले कुछ समय के लिए खुश होते हैं, लेकिन देने वाले जीवन भर संतोष में जीते हैं। वैसे भी, दुनिया की नजरों में सम्मानित होना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि आपका अंतर्मन और ईश्वर आपको सम्मान की दृष्टि से देखें। अंत में बस एक बार फिर दोहराना चाहूँगा कि सेवा कीजिए, लेकिन बदले में धन्यवाद की अपेक्षा मत रखिए क्योंकि जिस दिन सेवा निस्वार्थ हो जाती है, उसी दिन वह पूजा बन जाती है और ऐसी पूजा का फल हमेशा जीवन को भीतर से समृद्ध कर देता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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