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बच्चा अक्सर वही बनता है, जो हम उसके भीतर बार-बार देखते हैं…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
3 minutes ago
4 min read

Oct 8, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अगर मैं आपसे पूछूँ कि आपके बच्चे ने आज क्या गलत किया, तो शायद आप कई बातें तुरंत गिना देंगे। लेकिन अगर मैं पूछूँ कि उसने आज क्या अच्छा किया, तो क्या आपके पास उतनी लंबी सूची होगी? सवाल आपको थोड़ा असहज महसूस करा सकता है। लेकिन सकारात्मक पैरेंटिंग के लिहाज से आवश्यक सवालों में ये शायद सबसे जरूरी सवाल है।


हम अपने बच्चों की बातों का आकलन बड़ी बारीकी से करते हैं। जैसे उनकी पढ़ाई, अंक, व्यवहार, मोबाइल, दोस्त, समय की पाबंदी आदि सब पर हमारी नजर रहती है और यह जरूरी भी है। लेकिन कई बार हमारा फ़ोकस इन बातों या यूँ कहूँ इनमें छिपी गलतियों पर इतना ज़्यादा हो जाता है कि हम बच्चे की कोशिशों, छोटी-छोटी अच्छाइयों और उसके भीतर छिपी संभावनाओं को देखना ही भूल ही जाते हैं। जैसे बच्चा सुबह समय पर उठ गया, पर हमने उसे कुछ नहीं कहा। उसने अपना कमरा व्यवस्थित किया, लेकिन हमने नोटिस नहीं किया। उसने किसी की मदद की पर शायद हमने उस पर ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन इसके विपरीत अगर उसने होमवर्क अधूरा छोड़ा, हमने तुरंत उसे कह दिया, “तुम कभी समय पर काम नहीं करते!”


दोस्तों, मुझे ऐसा लगता है कि हमें बच्चों से ऐसा व्यवहार करने याने छोटी-छोटी गलतियों पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देने के स्थान पर थोड़ा रुककर सोचना चाहिए कि कहीं हम अपने बच्चों को केवल उनकी गलतियों के माध्यम से पहचानना सिखा रहे हैं? याद रखियेगा, बच्चे के लिए माता-पिता की नजर केवल नजर नहीं होती। वह उसके लिए एक आईना होती है। बच्चा धीरे-धीरे अपने बारे में वही मानने लगता है, जो उसे अपने सबसे महत्वपूर्ण लोगों की आँखों में दिखाई देता है। अगर उसे बार-बार सुनने को मिलता है कि, “तुम बहुत लापरवाह हो।”, “तुम्हें कुछ समझ नहीं आता।”, “तुम हमेशा गलती करते हो।”, तो हो सकता है कुछ समय बाद वह गलती को केवल अपना व्यवहार नहीं, अपनी पहचान मानने लगे।


दोस्तों, पैरेंट के रूप में हमें सावधानी पूर्वक अपने इस व्यवहार को पहचानना होगा और साथ ही समझना होगा कि हमें बच्चे की गलती को सुधारना है, उसकी सेल्फ इमेज को खत्म नहीं करना है। अर्थात् बच्चे को यह बताना तो जरूरी है कि उसका काम गलत था, लेकिन उसे यह महसूस कराना भी उतना ही जरूरी है कि वह स्वयं गलत नहीं है।


इसलिए अगली बार जब बच्चा कुछ अच्छा करे, तो उसे पहचानिये। अंग्रेजी में इसे ही कहते हैं, “Catch them being good.” याने जब वह अपने भाई या बहन की मदद करे, तभी उसे कहिए , “मैंने देखा कि तुमने उसकी मदद की। यह बहुत अच्छी बात है।” अच्छे से प्रयास करने के बाद भी अगर परीक्षा में कम अंक आए हैं, तो कहिए, “कोई बात नहीं। इस बार परिणाम तुम्हारी उम्मीद के अनुसार नहीं आया, लेकिन मैंने तुम्हारी मेहनत देखी है।” उसने अपनी गलती स्वीकार की तो कहिए,“गलती मानने का साहस हर किसी में नहीं होता।” याद रखिएगा, बच्चों के जिस व्यवहार को हम पहचानते और सराहते हैं, उसके दोहराए जाने की संभावना बढ़ती है।


इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम बच्चों की गलतियों को नजरअंदाज करें। अनुशासन जरूरी है। सीमाएँ जरूरी हैं। गलत व्यवहार को रोकना भी जरूरी है। लेकिन उन्हें सुधारने का तरीका ऐसा होना चाहिए कि बच्चा अपने बारे में निराश होने के स्थान पर अगली बार बेहतर करने के लिए प्रेरित हो। इसलिए “तुम बहुत लापरवाह हो” की जगह कहिए, “इस काम में तुमसे लापरवाही हुई है। अगली बार इसे बेहतर कैसे कर सकते हैं?” पहला वाक्य पहचान पर चोट करता है, दूसरा रास्ता दिखाता है और यही अंतर एक बच्चे के आत्मविश्वास और आत्म-संदेह के बीच खड़ा हो सकता है।


मेरी इस बात से सहमत हों तो अगले सात दिनों के लिए एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए, बच्चों की गलतियाँ पकड़ने से ज्यादा उन्हें अच्छा करते हुए पकड़ने की कोशिश कीजिए। याने उसकी कोशिश, संवेदनशीलता, ईमानदारी, ली गई जिम्मेदारी और हर छोटी से छोटी प्रगति को देखिए और जहाँ भी कुछ अच्छा दिखाई दे, तो उसे शब्द दीजिए क्योंकि बच्चों के लिए केवल यह जानना जरूरी नहीं है कि उन्हें क्या सुधारना है, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि उनके भीतर क्या अच्छा है।


दोस्तों, बच्चों की जिन बातों पर हमारा ध्यान लगातार रहता है, वो उसी दिशा में आगे बढ़ता है। अगर हमारा ध्यान केवल कमियों पर रहेगा, तो वो अपनी कमियाँ गिनना सीख जाएगा। लेकिन अगर हमारा ध्यान उसकी क्षमताओं पर रहेगा, तो वह अपनी संभावनाओं को पहचानना सीख जाएगा। याद रखिएगा, पैरेंटिंग का उद्देश्य केवल एक ऐसा बच्चा बनाना नहीं है जो गलतियाँ न करे। उसकी उद्देश्य तो ऐसा इंसान तैयार करना है, जो अपनी गलतियों से सीख सके, अपनी अच्छाइयों पर भरोसा कर सके और हर दिन कल से थोड़ा बेहतर बनने का प्रयास करे।


दोस्तों, बच्चे हमारी डाँट से जीवन में उतना आगे नहीं बढ़ते, जितना हमारे ध्यान से बढ़ते हैं। इसलिए ध्यान दीजिए कि आपकी नजर उन्हें कहाँ ले जा रही है क्योंकि बच्चा अक्सर वही बनता जाता है, जिसे हम उसके भीतर बार-बार देखते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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