बढ़ना हो आगे तो लें हर ठोकर से सीख !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 3 hours ago
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Sep 2, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हम सभी सफल तो होना चाहते हैं, लेकिन असफल होने से बचना चाहते हैं। हमें जीत की कहानी सुनना तो अच्छा लगता है, लेकिन हार की कहानी सुनते ही हम असहज हो जाते हैं। शायद इसलिए क्योंकि समाज सफलता को सम्मान देता है और असफलता को सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। लेकिन मेरे जीवन का अनुभव, समाज की इस भावना से थोड़ा अलग है। मेरा तो मानना है कि असफलता, जिससे हम बचना या भागना चाहते हैं, वही कई बार हमें सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी पाठ सिखाने के लिए आती है। इसी बात को समझाते हुए अभिनेता जॉर्ज क्लूनी ने कहा था, “हम अपनी और दूसरों की गलतियों से सीखते हैं। सच तो यह है कि सफलता हमें उतना नहीं सिखाती, जितना असफलता सिखा देती है।”
दोस्तों, सुनने में बात बहुत सरल है, लेकिन इसके भीतर जीवन का गहरा सत्य छिपा है। सफलता के दौर में हमारा फोकस ‘हमने क्या सही किया’ पर रहता है। लेकिन असफलता, हमें ख़ुद से यह पूछने के लिए मजबूर करती है कि ‘हमने कहाँ गलती करी।’ और यही प्रश्न हमारे विकास की शुरुआत बन जाता है। उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी के परीक्षा में अच्छे अंक आ गए। तो वह खुश होगा, उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और उसे लगेगा कि उसने सही तरीक़े से तैयारी की थी। लेकिन यदि वही विद्यार्थी असफल हो जाए, तो उसे अपनी कमियाँ खोजनी पड़ेंगी। उसे सोचना होगा कि उसने समय का सही उपयोग किया या नहीं? उसकी तैयारी कहीं सतही तो नहीं थी? उसने पाठ को समझा था या सिर्फ़ रटा था? उसने अपनी कमजोरियों को नजरअंदाज तो नहीं किया था ? याने सफलता परिणाम देती है, लेकिन असफलता आत्म-विश्लेषण का अवसर देती है।
मेरा तो बल्कि यहाँ तक मानना है कि समझदारी केवल अपनी गलतियों से सीखने में ही नहीं, बल्कि दूसरों की गलतियों से सीखने में है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यवसायी ने बाजार में नुकसान उठाया है, तो दूसरे व्यवसायी के पास दो विकल्प हैं। पहला, उसे यह सोच कर नजरअंदाज करना कि “मेरी स्थिति तो अलग है।” दूसरा, सामने वाले की गलती का विश्लेषण कर यह सीख कर आगे बढ़ना कि मुझे किन-किन गलतियों से बचते हुए आगे बढ़ना है। पहला व्यक्ति अनुभव के लिए अपनी कीमत चुकाएगा। वहीं दूसरा व्यक्ति किसी और के अनुभव से सीखकर अपनी कीमत बचा लेगा। यही बुद्धिमत्ता है। लेकिन दुर्भाग्य से हम अक्सर गलतियों को छिपाने में उतनी ऊर्जा लगा देते हैं, जितनी उन्हें समझने में लगानी चाहिए और फिर असफल होने के बाद परिस्थितियों, समय, लोगों या किस्मत को दोष देते हैं। याने हम यह भूल जाते हैं कि हर असफलता के भीतर एक सवाल छिपा होता है, “अब तुम मुझसे क्या सीखोगे?” यदि हम उस सवाल का उत्तर खोज लें, तो असफलता व्यर्थ नहीं जाती।
एक महत्वपूर्ण बात और, हर गलती सीख नहीं बनती। वह तो हमारी शिक्षक तब बनती है जब हम ईमानदारी से उसका विश्लेषण करते हैं। एक ही गलती को बार-बार दोहराना अनुभव नहीं, बल्कि बेवक़ूफ़ी है। इसलिए जब जीवन में असफलता आए, तो स्वयं को असफल व्यक्ति मत मानिए। केवल यह स्वीकार कीजिए कि आपका एक प्रयास असफल हुआ है। व्यक्ति और उसकी असफलता एक ही चीज नहीं हैं। हमें अपने बच्चों को भी यही सिखाने की आवश्यकता है। यदि बच्चा हर गलती पर डाँट से डरने लगेगा, तो वह प्रयोग करना बंद कर देगा। लेकिन यदि उसे यह विश्वास होगा कि गलती के बाद उसे सीखने का अवसर मिलेगा, तो उसमें जिज्ञासा, साहस और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित होगी।
याद रखिएगा, गलती करना कमजोरी नहीं है; गलती से कुछ न सीखना कमजोरी है। इसलिए अगली बार जब कोई योजना विफल हो, कोई निर्णय गलत साबित हो या कोई रास्ता आपको मंज़िल तक न पहुँचा पाए, तो खुद से केवल इतना पूछिए, “इस अनुभव ने मुझे क्या सिखाया?” दोस्तों, सफलता आपको तालियाँ दे सकती है, लेकिन असफलता आपको दृष्टि देती है। सफलता आपको पहचान दे सकती है, लेकिन असफलता आपको परिपक्वता देती है। इसलिए ही कहते हैं, “जीवन में आगे वही बढ़ता है, जो हर ठोकर के बाद, कुछ सीखकर उठता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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