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मंजिल पर पहुंचना है तो कदम तो उठाना ही होंगे !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

July 9, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अक्सर हम अपनी असफलताओं का कारण संसाधनों की कमी को मान लेते है। कोई मान कर चलता है कि “अगर मेरे पास अच्छे औज़ार होते, तो मैं बेहतर काम कर पाता।” कोई कहता है, “अगर मुझे बेहतर अवसर मिलते, तो मैं बहुत आगे होता।” तो कोई शिक्षा, तो कोई पैसों या फिर कोई किसी और वजह को कारण बताता है। लेकिन इतिहास और जीवन का अनुभव इस विषय में कुछ अलग ही कहता है।


दोस्तों, दुनिया में असाधारण काम करने वाले अधिकांश लोगों ने शुरुआत असाधारण सुविधाओं से नहीं, बल्कि असाधारण संकल्प से की थी। उनके पास साधन कम थे, लेकिन दृढ़ इच्छा और हुनर बड़ा था। उनके सामने कठिन परिस्थितियाँ थी, लेकिन उनका दृष्टिकोण मजबूत था। इस बात का एहसास मुझे कुछ वर्षों पहले घटी एक घटना से हुआ था। असल में इंदौर से गाड़रवाड़ा जाते वक्त मेरी कार का टायर पंचर हो गया था। टायर को ठीक करवाने के लिए मैं पास ही की एक छोटी-सी पंचर की दुकान पर गया। दुकान या यूँ कहूँ टूटी सी वो गुमटी दिखने में इतनी साधारण थी कि पहली नज़र में विश्वास ही नहीं हुआ कि यहाँ ट्यूबलेस टायर का पंचर ठीक से बन पाएगा। उस दुकानदार के पास टायर खोलने के लिए न तो कोई बड़ी मशीन थी और ना ही न चमचमाते उपकरण या कोई आधुनिक व्यवस्था। बस वहाँ कोई था तो बस एक दुबला-पतला सा युवा, जो मेरे पास मुस्कुराते हुए आया और बोला, “सर, चिंता मत कीजिए मैं पाँच मिनिट में टायर बना देता हूँ।”


मैंने उसे कहा तो कुछ नहीं बस एक तरफ़ खड़ा होकर उसे काम करते हुए देखने लगा। उसके पास टायर खोलने का एक पुराना घिसा हुआ लीवर, हवा भरने की एक पुरानी सी मशीन और रबर पैच काटने वाली, कमजोर धार वाली कैंची जैसे कुछ पुराने से औजार थे। मैं मन ही मन सोच रहा था कि इन औज़ारों के साथ यह अच्छे से काम भी कर पाएगा या नहीं? लेकिन अगले कुछ मिनटों में ही मेरी सोच बदल गई। उसके हाथों में ऐसा आत्मविश्वास था कि पुराने औज़ार भी नए जैसे काम कर रहे थे। उसने बड़ी सावधानी से पंचर ढूँढा, उसे ठीक किया, हवा भरी और कुछ ही देर में कार चलने के लिए तैयार थी।


अंत में जब मैंने उसे तय रकम से ज़्यादा भुगतान किया, तो वह मुस्कुराते हुए बोला, “सर, जितना काम किया है, उतने ही पैसे दीजिए।” मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “रख लो भाई। इससे नए औज़ार खरीद लेना।” उसने बड़ी सहजता के साथ मेरी बात का जवाब देते हुए कहा, “सर, औज़ार तो समय के साथ पुराने होते ही रहते हैं। लेकिन अगर हाथ का हुनर पुराना हो जाए, तब असली समस्या शुरू होती है।”


अब ध्यान से बात सुनने की बारी मेरी थी। तभी वह अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोला, “सर, अच्छी मशीन काम को थोड़ा आसान बना सकती है, लेकिन काम तो इंसान ही करता है। अगर हुनर नहीं होगा, तो नई से नई और अच्छी से अच्छी मशीन भी बेकार है और अगर हाथ में हुनर है, तो पुराने साधन भी साथ दे देते हैं।” यकीन मानियेगा दोस्तों, उसके शब्द सीधे मेरे मन में उतर गए और मुझे एहसास हो गया कि हम सभी के जीवन की भी यही कहानी है।


दोस्तों, इस दुनिया में असफल लोग अपनी असफलता का कारण साधनों की कमी को बताते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि दुनिया बदलने वाले अधिकांश लोगों ने शुरुआत सीमित संसाधनों से ही की थी। उनके पास बस एक ही चीज थी, जीवन के प्रति सही नजरिया। याने वे हर हाल में सीखने, मेहनत करने और ईमानदारी से काम करने के लिए तैयार थे। उस दिन मैंने उसके व्यवहार से एक और महत्वपूर्ण बात सीखी थी, इस दुनिया में संतोष ही सबसे बड़ी संपत्ति है। जो व्यक्ति अपनी मेहनत का उचित मूल्य स्वीकार करना जानता है, वही अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर सकता है।


दोस्तों, उस दिन मैं केवल पंचर ठीक करवाकर नहीं लौटा था, मैंने उस दिन जीवन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत और सीखा था। जीवन में इंसान संसाधनों से नहीं, अपने दृष्टिकोण से आगे बढ़ता है। सुविधाएँ रास्ता आसान बना सकती हैं, लेकिन मंज़िल तक पहुँचने के लिए कदम हमें ही उठाने पड़ते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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