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महान बनने के लिए असाधारण नहीं, इंसान होना जरूरी है !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 15 hours ago
  • 3 min read

Feb 24, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इस दुनिया में हज़ारों ऐसे उदाहरण हैं जिसमें एक अकेले इंसान ने पूरी दुनिया को रास्ता दिखाया है; जीना सिखाया है। जी हाँ, एक ओर जहाँ सामान्य इंसान जीवन में सफलता, सम्मान, शांति और ख़ुशी की तलाश करते हुए सिर्फ़ अपने लिए जीता है, वहीं दुनिया को जीवन का असली अर्थ समझा कर जीने की दिशा दिखाने वाले लोग वे होते हैं, जो दूसरों के लिए जीने का साहस रखते हैं। आज मैं आपका परिचय ऐसे ही एक असाधारण इंसान से करवाता हूँ जिन्हें “द मैन विद द गोल्डन आर्म” के नाम से जाना जाता है। जी हाँ आप सही अंदाजा लगा रहे हैं, मैं जेम्स हैरिसन के बारे में ही बात कर रहा हूँ।


14 वर्ष की उम्र में जेम्स की एक बड़ी सर्जरी हुई थी, जिसमें उनका एक फेफड़ा निकालना पड़ा था। इस वजह से उनकी छाती पर 100 टांके लगे और उन्हें स्वस्थ होने के लिए तीन महीने अस्पताल में रहना पड़ा। इस दौरान उन्हें लगभग 7.5 लीटर खून चढ़ाया गया। स्वस्थ होने के बाद जब जेम्स को उनके पिता से यह पता चला कि उनकी जान बचाने के लिए अजनबियों ने रक्त दान किया है और वह उनके नाम भी जीवनभर नहीं जान पायेगा, तब उन्होंने जीवन और मृत्यु के बीच खड़े होकर एक संकल्प लिया, “जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए रक्तदान करूँगा और उन अजनबियों द्वारा दिए गए जीवनदान का कर्ज चुकाऊँगा।”


यहाँ एक बात और जानना बेहद जरूरी है, यह वादा 14 साल के उस बच्चे ने किया था जिसे सुइयों से बेहद डर लगता था। उनके इस डर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1954 में 18 साल का होने पर जब वे पहली बार रक्तदान के लिए गए तो नर्स द्वारा नीडल लगाते वक्त वे छत को देख रहे थे। लेकिन वे यहाँ रुके नहीं, इसके बाद उन्होंने 64 वर्षों तक बिना रुके, बिना एक भी अपॉइंटमेंट मिस किए 1,173 बार रक्तदान किया। इतना ही नहीं, एक रक्तदान के दौरान की गई जांचों में डॉक्टरों को पता चला कि उनके रक्त में एक दुर्लभ एंटीबॉडी है, जिससे बनने वाली दवा गर्भवती महिलाओं और उनके शिशुओं को एक घातक बीमारी, रीसस डिजीज, से बचा सकती है। जो आरएच नेगेटिव महिला के गर्भ में पल रहे आरएच पॉजिटिव बच्चे को होती है। जिसमें माँ का शरीर बच्चे की रक्त कोशिकाओं पर हमला कर देता था, जिसके परिणामस्वरूप गर्भपात अथवा मृत बच्चे या मस्तिष्क को नुकसान पहुंचे बच्चे का जन्म हो सकता था। इस खोज से पहले, ऑस्ट्रेलिया में हर साल हज़ारों बच्चे मर जाते थे।


डॉक्टरों ने जेम्स को बताया कि उनके रक्त में इसका समाधान है, पर इसके लिए उन्हें केवल प्लाज्मा दान करना होगा। जिसका सत्र रक्तदान के 20 मिनट के सत्र के मुकाबले 90 मिनट का होगा। जेम्स ने सोचा उनके रक्त में यह एंटीबॉडीज़ शायद उन सभी रक्त चढ़ाने की वजह से बनी हैं, जो उन्हें बचपन में मिले थे। वे तुरंत इसके लिए तैयार हो गए और उसके बाद जीवनभर, हर दो-तीन हफ्तों में बिना कोई अपॉइंटमेंट मिस किए प्लाज्मा दान करने के लिए अस्पताल पहुंचते रहे। इसके पीछे ना तो उनका कोई स्वार्थ था, ना ही और कोई व्यक्तिगत लाभ था; यह तो बस एक भावना थी कि, “उनके इस रक्तदान से किसी का जीवन बच जाए।”


दोस्तों, एक अनुमान है कि जेम्स के रक्त से बने एंटी-डी इंजेक्शन ने 24 लाख से अधिक बच्चों की जान बचाई। सोचिए, एक साधारण व्यक्ति, बिना किसी सुपर पॉवर, बिना कोई बड़े पद या ढेर सारे पैसे के, लाखों जीवन का रक्षक बन गया। उनकी विनम्रता भी उतनी ही महान थी। जब लोग उन्हें हीरो कहते थे, तो वे मुस्कुराकर सिर्फ़ इतना कहते, “मैं तो बस सुरक्षित कमरे में बैठकर रक्त देता हूँ, कॉफ़ी पीता हूँ और घर चला जाता हूँ।”


दोस्तों, इस कहानी का सार बहुत गहरा है। जीवन की महानता बड़े अवसरों से नहीं, छोटे लेकिन लगातार किए गए नेक कार्यों से बनती है। हम सबके पास “गोल्डन आर्म” नहीं हो सकती, पर “गोल्डन हार्ट” जरूर हो सकता है। जिससे हम किसी की मदद कर सकते हैं, किसी को हौसला दे सकते हैं, किसी का दर्द बाँट सकते हैं और हमारे यह छोटे कदम किसी के लिए पूरी दुनिया बदल सकते हैं। याद रखिएगा, महान बनने के लिए असाधारण होना जरूरी नहीं, इंसान होना जरूरी है। इसलिए काम इतना बड़ा करो कि दुनिया सलाम करे, और मन इतना छोटा रखो कि अहंकार जगह ही न पाए।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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