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रुको… और खुद को देखो !

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 17 hours ago
  • 3 min read

Apr 5, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो पाएँगे कि हम सब एक अजीब सी दौड़ में हैं, जहाँ हर कोई जीतना तो चाहता है, पर जानता ही नहीं है कि असली जीत क्या है। इसीलिए जब हम जीत की होड़ में दूसरों से आगे निकलते हैं तो खुश होते हैं और जब ख़ुद से हारते हैं तो परेशान। यही परेशानी हमारे भीतर एक अनजाना ख़ालीपन छोड़ जाती है, जो मेरी नज़र में जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास है। आज का इंसान बाहर से बहुत मजबूत दिखता है, लेकिन अंदर से अक्सर बिखरा हुआ होता है। आज के इस आधुनिक युग में जहाँ एक ओर इच्छाएँ और उम्मीद बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर तुलना और बेचैनी भी बढ़ रही है। ऐसे समय में ठहराव के साथ जीना ही हमें शांत, संतुष्ट और सुखी रख सकता है। इसलिए हम सभी को “रुको… और खुद को देखो!” को अपनी जीवनशैली बनाना चाहिए। दोस्तों, ठहराव वाला यही वो मार्ग है जिसे भगवान महावीर स्वामी, भगवान गौतम बुद्ध जैसे गुरुओं ने हमें सिखाया था।


दोस्तों, गहराई से अगर देखा जाये तो ये सभी गुरु जीवन को थोड़ा अलग नजरिये से देखा करते थे। ये सभी लोग हमेशा जीवन को “मैं क्या पा सकता हूँ?” के स्थान पर “मैं क्या दे सकता हूँ? के भाव से देखा करते थे। देने के इसी भाव के कारण इन सभी ने अपनी जीवनशैली में अच्छा-खासा बदलाव किया और कम से कम संसाधनों के साथ जीना शुरू किया। मिनिमलिज्म का सिद्धांत दोस्तों अध्यात्म के इसी भाव के साथ शुरू हुआ है, जिसमें हमारे गुरुओं ने “मैं क्या छोड़ सकता हूँ?” के भाव के साथ असली क्रांति शुरू की है।


दोस्तों, हमने हमेशा यह सीखा है कि जितना ज्यादा मिलेगा, उतना ज्यादा सुख मिलेगा। लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है, जितना कम बोझ होगा, उतना हल्का जीवन होगा। आपने कभी महसूस किया है? जब मन में गुस्सा होता है, तो कितना भारी लगता है… जब अहंकार आता है, तो रिश्ते कितने दूर हो जाते हैं… जब इच्छाएँ बढ़ती हैं, तो संतोष कहीं खो जाता है… और जब आप इन्हें छोड़ देते हैं, तो भीतर एक अजीब सी शांति उतर आती है। यही “शांत जीत” है। यह जीत शोर नहीं करती, यह जीत दिखावा नहीं करती, लेकिन यह आपको अंदर से बदल देती है। महावीर स्वामी ने हमें सिखाया, बाहर की दुनिया को जीतने से पहले, अपने भीतर की अशांति को जीतो क्योंकि अगर मन ही अशांत है, तो सारी उपलब्धियाँ भी अधूरी लगती हैं और अगर मन शांत है, तो साधारण जीवन भी आनंद से भर जाता है।


दोस्तों, अगर आप अपना जीवन सुख, शांति, सद्भाव और पूर्णता के भाव के साथ जीना चाहते हैं, तो गुरुओं द्वारा बताई इस सच्चाई को स्वीकारिये कि उपरोक्त जीवनशैली को और ज़्यादा जोड़ने के भाव के साथ नहीं, बल्कि थोड़ा कम करके जीने के भाव के साथ पाया जा सकता है। इसलिए दोस्तों आज से थोड़ा कम गुस्सा, थोड़ा कम तुलना करना और थोड़ी कम अपेक्षाएँ रखना शुरू करें और जीवन में थोड़ा ज्यादा स्वीकार्यता का भाव, थोड़ी करुणा और थोड़ी जागरूकता लाएँ। मेरी नजर में इस युग की यही असली साधना है।


इसलिए दोस्तों आज से एक छोटा सा प्रयोग करें, जब भी कोई स्थिति आपको विचलित करे, तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले एक पल ठहरें। बस एक पल… और उस एक पल में आप पाएँगे की आपके पास चुनने के लिए विकल्प हैं। जैसे, गुस्सा करने के स्थान पर आप शांत रहना चुन सकते हैं। याद रखियेगा दोस्तों, यही पल आपकी असली शक्ति है क्योंकि जो खुद को सम्भाल सकता है, उसे दुनिया सम्भालने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसलिए ही तो कहते हैं, दुनिया की सबसे बड़ी जीत वह नहीं है जो दुनिया देख सकती है, सबसे बड़ी जीत तो वह है जो आपको भीतर से मुक्त कर देती है। याने भीतर से मुक्त होना ही सच्ची और स्थायी जीत है, जो अंततः जीवन को सार्थक बनाती है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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