हो जाएगा…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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Apr 4, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हम सब जानते हैं कि हमारी सोच ही हमारा जीवन बनाती है। लेकिन इसके बाद भी हम दिन भर में ना जाने कितनी बार ‘ना’ या ‘नहीं’ कहते हैं। जैसे, ‘मुझसे नहीं हो पायेगा…’, ‘ये तो हो ही नहीं सकता…’, ‘ये नहीं बन सकता…’, ये तो मेरे बस का नहीं है…’, आदि। सच कहूँ तो, शायद हमें खुद भी पता नहीं होता है कि अनजाने में कितनी बार हम ‘ना’ कह जाते हैं और ये ‘ना’ हमारे जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। याने हमें एहसास ही नहीं होता कि ये छोटा सा शब्द धीरे-धीरे हमारी सोच, हमारी हिम्मत और हमारे सपनों को छोटा करता जाता है।
दोस्तों, इसका प्रभाव हमारे सबकॉन्शियस माइंड पर इतना अधिक पड़ता है कि एक दिन हम ख़ुद से कहना शुरू कर देते हैं, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” जबकि सच तो यही है कि जीवन हमें वही देता है, जो हम उससे उम्मीद करते हैं। आपने देखा होगा, कुछ लोग बहुत कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते रहते हैं और कुछ लोग सब कुछ होते हुए भी हमेशा कमी महसूस करते रहते हैं। इन दोनों लोगों में फर्क सिर्फ सोच का होता है। जब हम बार-बार “नहीं” सोचते हैं, तो हम अपने ही रास्ते बंद कर देते हैं। याने हम अनजाने में ही अपने मन को यह संदेश दे देते हैं कि “अब कुछ बदलने वाला नहीं है।” और मन, वही मान लेता है। लेकिन इसके विपरीत आप जैसे ही एक छोटा सा बदलाव करते हैं और “नहीं होगा” की जगह “हो जाएगा” कहना शुरू करते हैं, तो अंदर याने हमारे अंतर्मन में कुछ बदलने लगता है। हमारे अंदर उम्मीद जागती है, हिम्मत लौटती है और रास्ते खुद बनने लगते हैं।
दोस्तों, इस सकारात्मक सोच से ही धीरूभाई अंबानी ने गैसोलीन पम्प पर कार्य करने से लेकर रिलायंस तक का सफ़र तय किया था। वैसे उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन फिर भी उन्होंने हमेशा बड़े सपने देखे। जब भी लोग उनसे कहते थे कि “यह नहीं हो सकता।” तो वे उनकी बातों को नजरंदाज करते हुए ख़ुद से प्रश्न पूछते हुए कहते थे, “क्यों नहीं हो सकता?” और इसी सवाल ने उनका जीवन हमेशा के लिए बदल दिया था।
दोस्तों, ‘ना’ या ‘नहीं’ सिर्फ एक शब्द नहीं है, यह एक डर है, जो हमें कोशिश करने से पहले ही रोक देता है और ‘हो जाएगा…’, सिर्फ उम्मीद नहीं है, यह एक विश्वास है, जो हमें गिरकर भी उठना सिखाता है। दोस्तों, जीवन में सबसे बड़ी हार तब नहीं होती जब आप असफल होते हैं, बल्कि तब होती है जब आप कोशिश करने से पहले ही मान लेते हैं कि ‘यह नहीं हो सकता।’
याद रखिएगा, आपके शब्द आपकी प्रार्थना हैं। आप जो सोचते हैं, वही आप जीवन से मांग रहे होते हैं। इसलिए अगर आप बार-बार ‘नहीं’ सोचेंगे, तो जीवन भी आपको वही लौटाएगा। लेकिन इसके विपरीत अगर आप हर परिस्थिति में ख़ुद से यह कहना सीख जाएँगे कि ‘हो जाएगा…, रास्ता निकल आएगा…’, तो धीरे-धीरे जीवन भी आपका साथ देना शुरू कर देगा।
दोस्तों, इसलिए आज से एक छोटा सा संकल्प लें और अब जब भी आपका मन कहे ‘नहीं होगा…’, तब ख़ुद से कहें ‘देखते हैं, कैसे होगा।’ इसी तरह जब हालात डराएँ, तब खुद को याद दिलाएँ, “हार मानने के स्थान पर मैं कोशिश करूँगा।’ क्योंकि ज़िंदगी उन्हें नहीं मिलती जो डरते हैं, ज़िंदगी तो उन्हें मिलती है जो भरोसा रखते हैं। अंत में इतना ही कहूँगा दोस्तों कि आपकी जिंदगी आपके शब्दों से बनती है। इसलिए पहले अपने शब्द बदलो, बदले हुए शब्द आपकी सोच बदलेंगे और सोच बदलते ही आपकी पूरी दुनिया बदल जाएगी।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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