शांति में समझ और समझ में समाधान है…
- Nirmal Bhatnagar

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Jan 10, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, अक्सर जीवन में छोटी-छोटी बातें बड़े तनाव का कारण बन जाती हैं। जैसे किसी योजना में थोड़ा सा परिवर्तन आ जाये, किसी कार्य में देर हो जाए या कोई बात हमारे हिसाब से ना हो पाये, तो हमारा मन घबराहट से भर जाता है। यहाँ मुख्य सवाल आता है कि इस तनाव की असल वजह क्या है? सही मायने में देखा जाये तो हमारी आदत क्योंकि ज़्यादातर समस्याएँ उतनी बड़ी नहीं होतीं, जितना हम उन्हें अपने मन में बना लेते हैं।
याद रखियेगा, तनाव की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह हमारी सोचने और समझने की शक्ति छीन लेता है। जब मन अशांत होता है, तब हम सही होते हुए भी गलत निर्णय ले लेते हैं। इसी वजह से भागदौड़ करने, अपना पूरा ज़ोर लगाने याने मेहनत करने के बाद भी अक्सर उलटा परिणाम पाते है। यह स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसे आँखों पर पर्दा होने की वजह से सब कुछ होते हुए भी कुछ दिखाई ना दे।
इसी वजह से जीवन में अक्सर हम समस्या को सुलझाने की जल्दी में, समस्या को और बढ़ा लेते हैं। घबराहट में किया गया प्रयास अक्सर हमें उसी जगह पहुँचा देता है जहाँ से हमने शुरुआत की थी और हाँ, कई बार तो उससे भी पीछे। इसलिए मेरा मानना है कि छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या का पहला समाधान बाहर नहीं, हमारे भीतर की शांति में छिपा होता है। जब मन शांत होता है, तो परिस्थितियाँ अपने आप स्पष्ट दिखने लगती हैं। तब हम समझ पाते हैं कि हर ट्रेन के छूट जाने से नुकसान नहीं होता, हर रुकावट असफलता नहीं होती, और हर देरी विपत्ति नहीं होती। कई बार रुकना ही हमें बचा लेता है, और ठहरना ही सही दिशा दिखाता है।
प्रार्थना: मांग नहीं, संवाद
उपरोक्त संदर्भ में प्रार्थना का सही अर्थ समझना भी बहुत ज़रूरी है। आज के युग में सामान्यतः हम प्रार्थना को अक्सर हम एक मांग–पत्र बना लेते हैं और ईश्वर के सामने खड़े होकर बस यह बताते रहते हैं कि हमें क्या चाहिए। याने हम ईश्वर से प्रार्थना के नाम पर सफलता, पैसे, समाधान, सुरक्षा आदि की कामना करते हैं। लेकिन सच्ची प्रार्थना इससे याने माँग पत्र से कहीं आगे की चीज़ है। सही मायने में प्रार्थना वे क्षण होते हैं, जब हम ईश्वर के साथ एकांत में होते हैं। जहाँ हम सिर्फ बोलते नहीं, सुनते भी हैं। जहाँ हम अपनी उलझनें रखते हैं, लेकिन साथ ही यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि जीवन हमसे क्या चाहता है। अगर प्रार्थना सिर्फ माँग तक सीमित रह जाए, तो हम सिर्फ़ अपनी आवाज़ सुनते रह जाते हैं और अनजाने में ही सुप्रीम पॉवर याने ईश्वर की आवाज को नजरंदाज कर जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो हम यह सुन ही नहीं पाते हैं कि ईश्वर हमें किस दिशा में चलने को कह रहे हैं; कैसा जीवन जीने का इशारा कर रहे हैं; कैसा आचरण होना चाहिए, बता रहे हैं; कैसे मन को साधना चाहिए, सिखा रहे हैं और किस तरह इस संसार के लिए ख़ुद को उपयोगी बनाना चाहिए, बता रहे हैं। वैसे भी दोस्तों, ईश्वर को यह बताने की ज़रूरत नहीं कि उन्हें क्या करना है, वे सब जानते हैं। उनसे संवाद करते वक्त तो हमें सिर्फ यह जानने की ज़रूरत है कि वे हमसे क्या चाहते हैं।
शांति, समझ और सही दिशा
जब हम तनाव छोड़कर शांति को चुनते हैं, जब हम घबराहट छोड़कर भरोसा करते हैं, और जब हम मांगने से ज़्यादा सुनना सीखते हैं, तब जीवन अपने आप हल्का होने लगता है। याद रखिएगा, अशांत मन समस्या बढ़ाता है, शांत मन समाधान दिखाता है। खुशियाँ बाँटते रहिए, धैर्य बनाए रखिए, और जीवन को थोड़ी सहजता के साथ जीना सीखिए क्योंकि सच्चा लाभ भगवान की मानने में है और उनकी मानने का अर्थ है शांति, समझ और सही आचरण के साथ जीना।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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