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संगत पर दें ध्यान…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 21, 2025
  • 3 min read

June 21, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

प्यारे बच्चों, बस अब आने वाले कुछ दिनों में आपके विद्यालय खुल जाएँगे और आप सभी फिर से नए लक्ष्यों के साथ अपनी-अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो जाएँगे। ठीक इसी तरह कुछ युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए आवश्यक शिक्षा लेने के लिए कॉलेज जाएँगे। स्कूल और कॉलेज दोनों जगह ही आपकी मुलाक़ात नए सहपाठियों के साथ होगी, जिनमें से कुछ आने वाले समय में आपके दोस्त बन जाएँगे। यही वह समय होगा मेरे प्यारे छोटे दोस्तों, जब आपकी ज़िंदगी और सपनों का फ़ैसला होगा क्योंकि संगत से ही रंगत बदलती है। दूसरे और सीधे शब्दों में कहूँ तो आपके दोस्त ही तय करेंगे कि आपका जीवन कैसा होगा। सुनने में शायद आप सभी को मेरी बात अतिशयोक्तिपूर्ण लग रही होगी, लेकिन ऐसा है नहीं। चलिए अपनी इसी बात को मैं आपको एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।


बात कई साल पुरानी है, एक प्रसिद्ध गुरुजी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिए काफ़ी बच्चे रहा करते थे। वे सभी बच्चे प्रतिदिन शिक्षा लेने के साथ-साथ अपनी साधना; अपनी भक्ति किया करते थे और आपस में अपने अनुभव साझा किया करते थे। कोई बच्चा कहता था कि आज उसे ध्यान में दिव्य प्रकाश दिखाई दिया, तो कोई कहता था, आज मैंने असीम शांति का अनुभव किया।


शिष्यों के इस समूह में एक ऐसा बच्चा भी था, जिसने कभी कोई अनुभव साझा नहीं किया था। इसी वजह से बीतते समय के साथ उसके मन में निराशा छाती जा रही थी। एक दिन उसने अपनी दुविधा गुरुजी से साझा करते हुए कहा, “गुरुजी! क्या मेरी साधना व्यर्थ जा रही है?” शिष्य का प्रश्न सुन गुरुजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल भी नहीं।” इस पर शिष्य बोला, “गुरुदेव, सभी शिष्यों को कुछ न कुछ अनुभव हो रहे हैं, लेकिन मुझे कुछ भी महसूस नहीं होता। क्या मुझसे कोई भूल हो रही है? क्या मैं बाकी शिष्यों जैसा नहीं बन सकता?”


शिष्य की दुविधा सुन गुरुजी ने बड़े प्रेमपूर्वक मुस्कुराते हुए कहा, “वत्स! तुम बिल्कुल सही दिशा में जा रहे हो। मैं तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब दूँगा लेकिन उससे पहले तुम आश्रम के बाहर, उस पुराने वृक्ष के नीचे, एकांत में साधना करो और जो अनुभव तुम्हें हो, वो मुझे बताओ।” गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अगले दिन शिष्य आश्रम के बाहर वाले वृक्ष के नीचे ध्यान करने बैठ गया। उस वक्त उस वृक्ष के ऊपर दो कौए बैठे हुए थे। ध्यान पूरा होने के बाद जब उस शिष्य ने आँखें खोली तो उसने देखा कि अब उस वृक्ष के ऊपर कौवों के स्थान पर दो हंस बैठे हुए है। यह देख उसे काफ़ी आश्चर्य हुआ, लेकिन वह बिना कुछ कहे वापस आश्रम लौट आया।


दूसरे दिन वह शिष्य फिर से अपनी साधना के लिए उसी स्थान पर गया। आज भी उसी पेड़ के ऊपर दो हंस बैठे हुए थे। उसने उन्हें नज़रअंदाज़ करा और अपनी साधना करने के लिए बैठ गया। जब उसका ध्यान टूटा तो उसने देखा कि दोनों हंस अब दिव्य आत्माओं में बदल गए हैं। अभी वह उन्हें आश्चर्य से देख ही रहा था कि तभी आकाश में एक पुष्पक विमान आया और वे दोनों दिव्य आत्माएँ इस शिष्य को प्रणाम कर उसमें बैठ गई और स्वर्ग की ओर उड़ गई।


यह सब देख शिष्य चौंक गया और भागा-भागा गुरुजी के पास पहुँचा और एक ही साँस में पूरी घटना कह गया। गुरुजी मुस्कुराए और बोले, “वत्स, यह तुम्हारी साधना का प्रभाव है। इन कौवों का कल्याण तुम्हारी संगत की वजह से हुआ है। जब वे पहले दिन तुम्हारे साथ बैठे तो कौवे से हंस बने और दूसरे दिन साथ बैठने पर उनका इतना कल्याण हुआ कि वे दिव्य आत्मा बन स्वर्ग चले गए। अब तुम्हें तुम्हारी साधना और सत्संगति का प्रभाव समझ आ गया होगा।”


बच्चों, अब तो तुम समझ ही गए होगे कि मैंने पहले अच्छे दोस्त चुनने के लिए क्यों कहा था। रिसर्च का एक आंकड़ा यह बताता है कि जिन पाँच लोगों के साथ हम ज़्यादा समय बिताते हैं, हम वैसे ही बन जाते हैं। वैसे यही बात हमें यह कहानी भी सिखाती है। यदि हम अच्छे लोगों, अच्छे दोस्तों और अच्छे विचारों की संगति में रहेंगे, तो हमारे भीतर भी अच्छे गुण आ जाएंगे। अगर हम बुरे साथियों से बचें और अच्छे व्यवहार करने वालों के साथ रहें, तो हमारा जीवन भी सुंदर और सफल बन सकता है। इसलिए हमेशा सोच-समझकर दोस्त बनाओ; अच्छी संगत की आदत डालो और बुरी संगत से दूर रहो क्योंकि संगति से ही हमारी सोच, आदतें और भविष्य तय होता है। याद रखना, सत्संग से संस्कार बनते हैं, और संस्कार से चरित्र और चरित्र ही जीवन की असली पूंजी है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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