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संघर्ष ही सफलता की कुंजी है…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
May 21, 2025
3 min read

May 21, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आइए दोस्तों, आज हम जीवन को हसीन बनाने का सूत्र एक कहानी के माध्यम से सीखते हैं। बात कई सौ साल पुरानी है, राजपुर के प्रतापी राजा के परोपकारी और जनकल्याण के कार्यों को देख एक दिन राज्य में आए विदेशी आगंतुक ने उन्हें उपहार स्वरूप एक दुर्लभ और बेशक़ीमती पत्थर भेंट किया। राजा को वह पत्थर बहुत पसंद आया इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि वे इस पत्थर से भगवान विष्णु की प्रतिमा बनवायेंगे और उसे राज्य के सबसे बड़े मंदिर में स्थापित करवायेंगे। विचार के निश्चय में बदलते ही उन्होंने अपने महामंत्री को बुलवाया और उन्हें यह कार्य सौंप दिया। महामंत्री ने इलाके के सबसे प्रसिद्ध मूर्तिकार को बुलवाया और उन्हें पत्थर सौंपते हुए कहा, ‘महाराज चाहते हैं कि इस पत्थर से एक बड़ी सुंदर भगवान विष्णु की मूर्ति बनाकर उसे राज्य के सबसे बड़े मंदिर में स्थापित किया जाए। इस कार्य के लिए आपको चुना गया है। आपको सात दिनों के भीतर इस मूर्ति को तैयार करना होगा। इस कार्य के मेहनताने स्वरूप आपको 50 स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँगी।’


महामंत्री की बातों को सुन मूर्तिकार बड़ा प्रसन्न हुआ और महामंत्री और राजा को धन्यवाद देते हुए अपने औजार लेने चला गया। 50 स्वर्ण मुद्राओं के मेहनताने को सुन उसका उत्साह कई गुना बढ़ गया था, इसलिए बिना एक भी क्षण गँवाए वह वापस लौट कर आया और पत्थर पर कार्य करना आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम उसने मूर्ति की कल्पना की और फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ छेनी-हथौड़ी लेकर उसपर वार करने लगे। लेकिन कई प्रहार के बाद भी पत्थर जस का तस बना रहा। जब 50 बार वार करने के बाद भी पत्थर जस का तस रहा तो मूर्तिकार की हिम्मत जवाब देने लगी और वह सोचने लगा कि ‘जब 50 बार वार करने से यह पत्थर नहीं टूटा, तो अब क्या टूटेगा?’ निराशा भरे विचार आते ही उसने हार मानी और कार्य का निरीक्षण करने आए महामंत्री से बोला, ‘महामंत्री जी, यह पत्थर बहुत कठोर है, इससे मूर्ति बनाना असंभव है।’ महामंत्री जी उसकी मनोदशा समझ गए और उसे कार्य से मुक्त कर दिया।


राजा के आदेश का पालन करना, महामंत्री अपना धर्म मानते थे और इसीलिए वे इस कार्य को हर हाल में पूरा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने कुछ देर विचार कर इस कार्य को गाँव के एक साधारण मूर्तिकार को सौंप दिया। दूसरा साधारण मूर्तिकार भी मेहनताने की राशि को सुन उत्साहित हुआ और भगवान को याद कर बिना कोई संकोच के हथौड़े से जोरदार प्रहार किया, जिससे पत्थर पहले ही वार में टूट गया। महामंत्री जी यह देख अचंभित थे और सोच रहे थे, ‘काश पहले मूर्तिकार ने एक और प्रयास किया होता, तो वह सफल हो गया होता और मेहनताने के तौर पर ५० स्वर्ण मुद्राओं का हकदार बनता।’


दोस्तों, यह कहानी हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सिखाती है, ‘जीवन में कभी भी हार मत मानो!’ कई बार हमें किसी कार्य में बार-बार असफलता हाथ लगती है और हम निराश होकर प्रयास करना छोड़ देते हैं। ऐसे दौर में हमें ख़ुद को सिर्फ़ एक बात याद दिलाना चाहिए कि ‘हो सकता है, हमारा अगला प्रयास हमें सफल बना देगा।’ जी हाँ दोस्तों, हमेशा याद रखियेगा, जीवन में सफलता उन्हीं को मिलती है जो निरंतर प्रयास करते हैं। इसलिए दोस्तों, निम्न बातों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लीजिए-

1) जब हम किसी समस्या का समाधान ढूंढने में असफल होते हैं, तो हमें निराश होने के बजाय एक और प्रयास करना चाहिए।

2) असफलता तब तक हमें असफल सिद्ध नहीं कर सकती, जब तक हम कोशिश करना बंद नहीं कर देते।

3) हो सकता है, जिस अंतिम प्रयास को करने से पहले हम हार मान रहे हैं, वही हमें सफलता की ओर ले जाए।


इसलिए दोस्तों, कितनी भी असफलताएँ क्यों ना मिल जायें हार मत मानियेगा और अंतिम प्रयास मत छोड़ियेगा क्योंकि सफलता आपसे सिर्फ़ एक प्रयास दूर हो सकती है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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