सकारात्मक पैरेंटिंग के तीन प्रमुख स्तंभ…
- Nirmal Bhatnagar

- 3 days ago
- 3 min read
Jan 12, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, “पैरेंटिंग”, मेरी नजर में इस दुनिया का सबसे सुंदर, सबसे आनंददायक और सबसे ज़्यादा संतुष्टि देने वाला सफ़र है। लेकिन यह यात्रा कतई आसान नहीं है क्योंकि इस यात्रा के दौरान हम कई लक्ष्य एक साथ लेकर चलते हैं, जैसे, हमारे बच्चे जीवन में सही फैसले लेना सीखकर, सुरक्षित रहते हुए, सफल बनें। उनके जीवन में किसी भी तरह की परेशानी या चुनौती ना आए। इतना ही नहीं अपनी इस चाहत को पूरा करने के चक्कर में हम कई बार यह भी भूल जाते हैं कि बच्चे इस दुनिया में अपना जीवन जीने के लिए आए हैं, हमारा नवीन संस्करण बनने के लिए नहीं। इन्हीं सब बातों की वजह से मैं पैरेंटिंग को दुनिया का सबसे चुनौतीपूर्ण सफ़र मानता हूँ।
अगर आप इस चुनौतीपूर्ण सफ़र को अपने जीवन का सबसे यादगार सफ़र बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले इस सूत्र को स्वीकारें कि सकारात्मक पैरेंटिंग की नींव भरोसा, मार्गदर्शन और धैर्य नाम के तीन स्तंभों पर टिकी है। जी हाँ, इन तीनों बातों को समझकर स्वीकारना और संतुलित करना ही आपको इस चुनौतीपूर्ण कार्य को सफलतापूर्वक करने में मदद करता है। आइए, इन तीनों स्तंभों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा कर लेते हैं-
1. भरोसा
दोस्तों, आज के युग में समय तेज होने के साथ-साथ प्रतिस्पर्धात्मक है। इसलिए हर माता-पिता बच्चों को भटकने और असफल होने से बचाने के लिए उसके जीवन को नियंत्रित रखते हैं। लेकिन ऐसा करना याने बच्चे को रोकना, टोकना, पकड़ना या बार-बार बचाना कमजोर बनाता है। बच्चे को मजबूत और आत्मसम्मान से भरपूर बनाने के लिए सबसे पहले उसपर और ख़ुद पर भरोसा करें और याद रखें उसके जीवन का सर्वोत्तम और सबसे बड़ा उपहार आपका भरोसा, आपका विश्वास है। भरोसा करने का मतलब यह नहीं है कि आप अपना संरक्षण हटा दें, बल्कि यह कि-
१) आप उसकी क्षमता में विश्वास रखते हैं
२) आप उसके प्रयासों की कद्र करते हैं
३) आप उसे ग़लतियाँ करने की अनुमति देते हैं
याद रखें, बच्चा तभी मजबूत बनता है जब उसे अपने फैसलों, गलतियों और अनुभवों से सीखने का मौका मिलता है और साथ ही भरोसा या विश्वास बच्चे को पंख देता है और नियंत्रण केवल पिंजरा बनाता है।
2. मार्गदर्शन
पालन-पोषण का अर्थ बच्चे को जीवनभर हाथ पकड़कर चलाना नहीं है। बल्कि उसे इतना सक्षम बनाना है कि वह जीवन में खुद चल सके, और गिरे तो दोबारा उठ सके। इसलिए उसे मार्गदर्शन दें, जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएँ। इसके लिए-
१) जीवन में आगे बढ़ने के नियम सिखायें, डरायें नहीं
२) उसपर दबाव बनाने के स्थान पर सच्चाई क्या है यह बताएँ
३) बच्चों के स्थान पर निर्णय लेने की जगह उन्हें सही दिशा दिखाएँ
दोस्तों, हमारा काम बच्चे को विकल्पों की रोशनी दिखाना है, न कि उसके लिए हर निर्णय लेना। जब माता-पिता हर समस्या का समाधान खुद करने लगते हैं, तो बच्चा एक ही बात सीखता है, “मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता…” और समय के साथ यह उसकी सबसे बड़ी असफलता बन जाती है।
3. धैर्य
जिस तरह एक पौधा, एक रात में पेड़ नहीं बनता, उसी तरह बच्चा भी एक दिन में परिपक्व नहीं होता। इसलिए धैर्य रखना सीखें। हर गलती का जवाब तुरंत डांटना नहीं होता; हर गलत व्यवहार का समाधान चीखकर नहीं मिलता और हर संघर्ष के लिए कठोरता की आवश्यकता नहीं होती। याद रखें, धैर्य बच्चे को यह सिखाता है कि दुनिया सुरक्षित है। धैर्य माता-पिता को यह सिखाता है कि हर चीज़ में आज ही परफेक्ट होने की ज़रूरत नहीं। धैर्य ही वह पुल है जो बच्चे की गलती और उसकी समझ के बीच खड़ा होता है।
पैरेंटिंग के संदर्भ में सबसे बड़ी गलतफहमी यह सोचना है कि माता-पिता का काम बच्चे को नियंत्रण में रखना है। जबकि मेरी नजर में असली काम बच्चे का सहयोग करना है। जीवन की यात्रा सुंदर तब बनती है जब माता-पिता यह समझ जाते हैं कि हर चीज़ उनके नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए। कुछ हिस्से जीवन को सौंपने पड़ते हैं; कुछ फैसले बच्चे पर छोड़ने पड़ते हैं और कुछ क्षण बस शांति से स्वीकार करने पड़ते हैं।
दोस्तों, अंत में इतना ही कहूँगा कि बच्चों का पालन-पोषण याने पैरेंटिंग कोई प्रोजेक्ट नहीं, एक रिश्ता है। जिसे हमें जीवन भर निखारना और निभाना है। इसलिए बच्चे को पूरी तरह से अपनी सोच के अनुसार ढालने की कोशिश छोड़ दें। उसे देखने दें, सीखने दें, चुनने दें और बढ़ने दें। उस पर भरोसा करिए ताकि उसके पंख खुल सकें; उसका मार्गदर्शन कीजिए ताकि उसे सही दिशा मिल सके और उसे धैर्य के साथ डील कीजिए ताकि समय के साथ वह खिल सके। याद रखिएगा, जिस दिन माता-पिता यह समझ लेते हैं, उसी दिन से बच्चों का जीवन भी आसान हो जाता है, और माता-पिता का भी।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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