सच्ची स्वतंत्रता चाहते हैं तो उत्तरदायित्व को समझें…
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 15, 2025
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Aug 15, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, सर्वप्रथम तो आप सभी को ७८वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। दोस्तों, यकीनन आज हम सभी बड़े गर्व और जोश के साथ वर्ष १९४७ के उस ऐतिहासिक पल को याद करेंगे जब हमें काफ़ी प्रयासों के बाद अंग्रेजों की हुकूमत से आज़ादी मिली थी। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ, हमने इस स्वतंत्रता की एक बड़ी क़ीमत चुकाई थी। इसी वजह से देशवासियों की ढेरों उम्मीदें और आशाएँ इसके साथ जुड़ी थी, जिसे पूरा करना निश्चित तौर पर चुनौतीपूर्ण था।
इन ७८ वर्षों में हमने उनमें से कई चुनौतियों को ना सिर्फ दूर किया, बल्कि सपनों का देश बनाने की दिशा में काफ़ी आगे भी बढ़े। शायद इसीलिए आज हम सभी अपने जीवन में "स्वतंत्रता" की बातें बड़े गर्व से करते हैं। हम चाहते हैं कि हमें अपनी मर्जी से जीने का अधिकार हो, निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो, और बिना किसी के हस्तक्षेप के जीवन जीने का अवसर मिले। लेकिन यहाँ सोचने वाली मुख्य बात यह है कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्रता के मायने समझते हैं? या फिर हम स्वतंत्रता के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को स्वीकार किए बिना केवल अधिकार चाहते हैं?
दोस्तों, मनुष्य के मन में स्वतंत्रता की कल्पना अक्सर सुविधा और मनमर्जी से जुड़ी होती है और जब भी किसी बंधन या जिम्मेदारी की वजह से यह मनमर्जी या सुविधा प्रभावित होती है, हम पूरे सिस्टम पर उँगलियाँ उठाने लगते हैं। इसी बात को समझाते हुए महान मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रायड ने कहा था, “अधिकांश लोग वास्तव में स्वतंत्रता नहीं चाहते, क्योंकि स्वतंत्रता जिम्मेदारी की मांग करती है और अधिकांश लोग जिम्मेदारी लेने से डरते हैं।”
वैसे, यह बात हमारे रोज़मर्रा के जीवन में साफ दिखाई देती है। हम चाहते हैं कि हमारे विचारों की इज़्ज़त हो, हमारी इच्छाओं को प्राथमिकता मिले, लेकिन जब कोई काम बिगड़ जाता है, तो हम उसकी ज़िम्मेदारी लेने से बचते हैं और दूसरों को दोष देना शुरू कर देते हैं क्योंकि यह आसान होता है। हम कभी यह जानने का प्रयास ही नहीं करते हैं कि इस पूरी असफलता में हमारी भूमिका क्या थी?
दोस्तों, मेरी नजर में हम सही मायने में स्वतंत्र तभी होते हैं जब हम अपने हर कार्य के लिए ख़ुद को उत्तरदायी मानना शुरू कर देते हैं। अर्थात् जब हम जीवन में मिलने वाले हर अच्छे और बुरे परिणाम की जिम्मेदारी ख़ुद के ऊपर लेते हैं, तभी हम सच में स्वतंत्र होते हैं। और हाँ, यह ज़िम्मेदारी केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर तक जाती है।
जिस तरह एक विद्यार्थी स्वतंत्र हो सपने देखता है, उसे पूरा करने के लिए अनुशासित रह, पढ़ाई करता है, ठीक उसी तरह स्वतंत्र जीवन जीने के लिए कुछ क़ानूनों का पालन करना भी आवश्यक होता है। यही बात परिवार के लिए भी लागू होती है। याने जब परिवार का एक सदस्य अपनी बात रखने की आज़ादी चाहता है, तो उसे दूसरों की भावनाओं और सीमाओं का भी सम्मान करना चाहिए।
दोस्तों, यह जिम्मेदारी कभी-कभी भारी लग सकती है, लेकिन यही जिम्मेदारी हमें निखारती है, परिपक्व बनाती है, और हमारे भीतर आत्मबल और नेतृत्व की भावना पैदा करती है। जो लोग जिम्मेदार बनना सीखते हैं, वे ही समाज में बदलाव लाते हैं। इसलिए, अगली बार जब आप स्वतंत्रता की बात करें, तो उसके साथ यह संकल्प भी लें कि आप अपने निर्णयों की, अपने शब्दों की, और अपने कर्मों की पूरी ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं। तभी आप न केवल एक बेहतर इंसान बन पाएंगे, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक उदाहरण बनकर उभरेंगे।
याद रखियेगा दोस्तों, स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, एक सौभाग्य है और यह सौभाग्य उसे ही मिलता है, जो इस जिम्मेदारी को उठाने का साहस रखता है। तो चलिए, स्वतंत्रता दिवस की ७८ वीं वर्षगांठ पर हम सब मिलकर एक निर्णय लेते हैं कि आज से हम सिर्फ अधिकारों की बात नहीं करेंगे, बल्कि उसके साथ अपने कर्तव्यों को भी निभायेंगे क्योंकि तभी हम सच्चे तौर पर स्वतंत्र हो पायेंगे।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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