सफलता चाहते हैं तो कम्फर्ट को छोड़ें…
- Nirmal Bhatnagar

- 4 hours ago
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May 19, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, एक छोटे से गाँव में एक युवक रहता था। उसे पहाड़ों को दूर से देखना बहुत पसंद था। हर शाम वह नदी किनारे बैठकर उन ऊँचे पहाड़ों को निहारता और सोचता, “काश, मैं एक दिन वहाँ तक पहुँच पाऊँ।” लेकिन फिर उसका मन डर जाता। वह खुद से कहता, “वहाँ का रास्ता कठिन होगा… मैं थक जाऊँगा… अगर गिर गया तो?” इसलिए वह हर दिन सिर्फ़ पहाड़ों को देखता, उनकी बातें करता, उनके सपने देखता… लेकिन कभी चलना शुरू नहीं करता। एक दिन गाँव में एक बुज़ुर्ग यात्री आया। उसने युवक से पूछा, “तुम रोज़ इन पहाड़ों को देखते हो, क्या कभी वहाँ गए हो?” युवक मुस्कुराकर बोला, “नहीं, मुझे डर लगता है।” बुज़ुर्ग ने शांत स्वर में कहा, “बेटा, पहाड़ दूर से हमेशा सुंदर लगते हैं। लेकिन उनकी ऊँचाई का आनंद सिर्फ वही ले पाता है, जो अपने आरामदायक किनारे को छोड़कर चलने का साहस करता है।”
यह बात युवक के दिल को छू गई। अगली सुबह उसने यात्रा शुरू कर दी। पहाड़ की ओर जाने का रास्ता कठिन था। कभी पथरीले रास्ते मिले, कभी बारिश आई, कभी वह थककर बैठ गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि उसका शरीर ही नहीं, उसका आत्मविश्वास भी मजबूत हो रहा है। कुछ दिनों बाद जब वह पहाड़ की चोटी पर पहुँचा, तो उसने पहली बार महसूस किया कि असल जीत पहाड़ तक पहुँचने में नहीं थी, असल जीत अपने डर और सीमाओं को पार करने में थी।
दोस्तों, हम सबके जीवन में भी ऐसे ही “पहाड़” होते हैं। कुछ लोग नई जिम्मेदारी लेने से डरते हैं। कुछ लोग नया काम शुरू करने से। कुछ लोग असफलता के डर से अपनी क्षमता ही नहीं पहचान पाते। हम अक्सर उसी दायरे में रहना चाहते हैं जहाँ सब कुछ सुरक्षित और परिचित लगे। लेकिन याद रखिए सुरक्षित जगहें हमें आराम तो देती हैं, लेकिन विकास नहीं देतीं। वास्तविक विकास तब शुरू होता है जब हम अपनी सीमाओं से बाहर निकलने का साहस करते हैं। जब हम वह करने की कोशिश करते हैं जिससे कभी डर लगता था। जीवन में जितनी भी बड़ी उपलब्धियाँ हैं, वे हमेशा आराम की सीमा के बाहर मिलती हैं। बीज अगर मिट्टी के भीतर सुरक्षित पड़ा रहे, तो कभी वृक्ष नहीं बन सकता। उसे अंधेरा सहना पड़ता है, मिट्टी को चीरना पड़ता है, तभी वह आकाश तक पहुँचता है। इसी तरह मनुष्य को भी अपने भीतर छिपी क्षमता तक पहुँचने के लिए संघर्ष और असुविधा से गुजरना पड़ता है।
दोस्तों, कई बार हम सिर्फ वही करना चाहते हैं जो हमें पसंद हो, जो आसान लगे, जो तुरंत परिणाम दे। लेकिन जीवन का सबसे बड़ा विस्तार तब होता है जब हम उन रास्तों पर भी कदम रखते हैं जहाँ सीख है, चुनौती है और अनिश्चितता है। अंत में बस एक बात, अगर आप हमेशा वही करते रहेंगे जो आसान है, तो आप हमेशा वहीं रहेंगे जहाँ आज हैं। इसलिए डरिए मत। नई शुरुआत कीजिए। असुविधा को स्वीकार कीजिए और अपनी सीमाओं से थोड़ा आगे बढ़िए क्योंकि मनुष्य की असली क्षमता उसे तब दिखाई देती है, जब वह अपने आरामदायक दायरे याने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना सीख जाता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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